तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १
( इन्द्रियदमन ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इन्हें सदा करता रहे ] । शम ( मनोनिग्रह ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ ये सर्वदा कर्तव्य हैं ] । अग्नि ( अग्न्याधान ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका अनुष्ठान करे ] । अग्निहोत्र तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ ये नित्य कर्तव्य हैं ] । अतिथि ( अतिथिसत्कार ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका नियम- से अनुष्ठान करे ] । मानुषकर्म ( विवाहादि लौकिक व्यवहार ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इन्हें करता रहे ] । प्रजा ( प्रजा उत्पन्न करना ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [-ये सदा ही कर्तव्य हैं ] । प्रजन ( ऋतु- कालमें भार्यागमन ) तथा [ इसके साथ ] स्वाध्याय और प्रवचन [ करता रहे ] । प्रजाति ( पौत्रोत्पत्ति ) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [ इनका नियतरूपसे अनुष्ठान करे ] । सत्य ही [ अनुष्ठान करने योग्य है ] ऐसा रथीतरका पुत्र सत्यवचा मानता है । तप ही [ नित्य अनुष्ठान करने योग्य है ] ऐसा नित्य तपोनिष्ठ पौरुशिष्ठिका मत है । स्वाध्याय और प्रवचन ही [ कर्त्तव्य हैं ] ऐसा मुद्गलके पुत्र नाकका मत है । अतः वे ( स्वाध्याय और प्रवचन ) ही तप हैं, वे ही तप हैं ॥ १ ॥
| [मूल भाष्य] | [हिन्दी अनुवाद] |
|---|---|
| ऋतमिति व्याख्यातम् । स्वा-<br>ध्यायोऽध्ययनम् । प्रवचनमध्या-<br>पनं ब्रह्मयज्ञो वा । एतान्यता-<br>दीन्यनुष्ठेयानीति वाक्यशेषः ।<br>सत्यं च सत्यवचनं यथाव्या-<br>ख्यातार्थं वा । तपः कृच्छ्रादि ।<br>दमो बाह्यकरणोपशमः । शमो-<br>ऽन्तःकरणोपशमः । अग्नय आधा- | 'ऋत'—इसकी व्याख्या पहले<br>[ ऋतं वदिष्यामि—इस वाक्यमें ] की<br>जा चुकी है । 'स्वाध्याय' अध्ययनको<br>कहते हैं, तथा 'प्रवचन' अध्यापन<br>या ब्रह्मयज्ञका नाम है । ये ऋत<br>आदि अनुष्ठान किये जाने योग्य<br>हैं—यह वाक्यशेष है । सत्य—सत्य-<br>वचन अथवा जैसा पहले [ सत्यं<br>वदिष्यामि—इस वाक्यमें ] व्याख्या<br>की गयी है, वह; तप—कृच्छ्रादि; दम—<br>बाह्य इन्द्रियोंका निग्रह; शम—चित्त-<br>**की शान्ति; |