भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ कर्तव्यमिति तपोन्नित्यस्तपसि । ऐसा तपोन्नित्य-नित्य तपोनिष्ठ नित्यस्तपःपरस्तपोनित्य इति वा अथवा तपोन्नित्य नामवाला पौरुशिष्टि नाम पौरुशिष्टिः पुरुशिष्टस्या- -पुरुशिष्टका पुत्र पौरुशिष्टि आचार्य पत्यं पौरुशिष्टिराचार्यो मन्यते । मानता है । स्वाध्याय और प्रवचन स्वाध्यायप्रवचने एवानुष्ठेये इति ही अनुष्ठान किये जाने योग्य हैं- नाको नामतो मुद्गलस्यापत्यं ऐसा नाक नामवाला मुद्गलका मौद्गल्य आचार्यो मन्यते । तद्धि पुत्र मौद्गल्य आचार्य मानता है । तपस्तद्धि तपः । हि यस्मात्स्वा- वही तप है, वही तप है । ध्यायप्रवचने एव तपस्तस्मात्ते इसका तात्पर्य यह है-क्योंकि एवानुष्ठेये इति । उक्तानामपि स्वाध्याय और प्रवचन ही तप हैं, सत्यतपःस्वाध्यायप्रवचनानां पु- इसलिये वे ही अनुष्ठान किये जाने नर्ग्रहणमादरार्थम् ॥ १ ॥ योग्य हैं । पहले कहे हुए भी सत्य, तप, स्वाध्याय और प्रवचनोंका पुनर्ग्रहण उनके आदरके लिये है ॥१॥

इति शीक्षावल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri