भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ कर्मोपन्यासादनन्तरं च वेदानु- | च' इत्यादि अनुवाकमें धर्मका वचनपाठादेतदवगम्यत एवं | उपन्यास ( उल्लेख ) करनेके | अनन्तर वेदानुवचनका पाठ करनेसे श्रौतस्मार्तेषु नित्येषु कर्मसु | यह जाना जाता है कि इस प्रकार युक्तस्य निष्कामस्य परं ब्रह्म | श्रौत और स्मार्त नित्यकर्मोंमें लगे विविदिषोराणानि दर्शनानि प्रा- | हुए परब्रह्मके निष्काम जिज्ञासुके प्रति | आत्मा आदिसे सम्बन्धित आर्षदर्शनों- दुर्भवन्त्यात्मादिविषयाणीति॥१॥ | का प्रादुर्भाव हुआ करता है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां दशमोऽनुवाकः ॥ १० ॥ एकादश अनुवाक वेदाध्ययनके अनन्तर शिष्यको आचार्यका उपदेश वेदमनूच्येत्येवमादिकर्तव्य- | ब्रह्मात्मैक्यविज्ञानसे पूर्व श्रौत प्राग्ब्रह्मविज्ञानात् कर्मविधिः | तोपदेशारम्भः प्रा- | और स्मार्तकर्मोंका नियमसे अनुष्ठान | ग्ब्रह्मविज्ञानान्निय- | करना चाहिये— इसीलिये ‘वेदम- मेन कर्तव्यानि श्रौतस्मार्त- | नूच्य’ इत्यादि श्रुतिसे उनकी | कर्तव्यताके उपदेशका आरम्भ किया कर्माणीत्येवमर्थः। अनुशासनश्रुतेः | जाता है; क्योंकि [ ‘अनुशास्ति’ पुरुषसंस्कारार्थत्वात् । संस्कृतस्य | ऐसी ] जो अनुशासन-श्रुति है वह | पुरुषके संस्कारके लिये है; क्योंकि जो हि विशुद्धसत्त्वस्यात्मज्ञानमञ्ज- | पुरुष संस्कारयुक्त और विशुद्धचित्त सैवोत्पद्यते । “तपसा कल्मषं | होता है उसे अनायास ही आत्मज्ञान हन्ति विद्ययामृतमश्नुते” ( मनु० | प्राप्त हो जाता है । इस सम्बन्धमें | “तपसे पापका नाश करता है और १२ ! १०४ ) इति स्मृतिः । | ज्ञानसे अमरत्व लाभ करता है” ऐसी वक्ष्यति च-“तपसा ब्रह्म विजि- | स्मृति है । आगे ऐसा कहेंगे भी कि

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