भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

७२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ नियुक्त अथवा आयुक्त (दूसरोंसे प्रेरित न होकर स्वतः कर्ममें परायण ), सरलहृदय और धर्माभिलाषी ब्राह्मण हों, वे जैसा व्यवहार करें तू भी वैसा ही कर । यह आदेश—विधि है, यह उपदेश है, यह वेदका रहस्य है और [ ईश्वरकी ] आज्ञा है । इसी प्रकार तुझे उपासना करनी चाहिये—ऐसा ही आचरण करना चाहिये ॥ ४ ॥ वेदमन्नूच्याध्याप्याचार्योऽन्ते- | वेदका अध्ययन करानेके अधीतवेदस्य वासिनं शिष्यमनु- | अनन्तर आचार्य अन्तेवासी—शिष्य- कर्तव्यनिरूपणम् शास्ति ग्रन्थग्रहणा- | को उपदेश करता है; अर्थात् ग्रन्थ- ग्रहणके पश्चात् अनुशासन करता दनु पश्चाच्छास्ति तदर्थं ग्राहयती- | है—उसका अर्थ ग्रहण कराता है । इससे ज्ञात होता है कि वेदाध्ययन त्यर्थः। अतोऽवगम्यतेऽधीतवेदस्य | कर चुकनेपर भी ब्रह्मचारीको बिना धर्मजिज्ञासा किये गुरुकुलसे समा- धर्मजिज्ञासामकृत्वा गुरुकुलान्न | वर्तन ( अपने घरकी ओर प्रत्या- गमन ) नहीं करना चाहिये । समावर्तितव्यमिति । "बुद्ध्वा | “कर्मोंका यथावत् ज्ञान प्राप्त करके उनके अनुष्ठानका आरम्भ करे” इस कर्माणि चारभेत्” इति स्मृतेश्च । | स्मृतिसे भी यही सिद्ध होता है । किस प्रकार उपदेश करता है ? सो कथमनुशास्तीत्याह— | बतलाते हैं— सत्यं वद यथाप्रमाणावगतं | सत्य बोल अर्थात् जो कहने- योग्य बात प्रमाणसे जैसी जानी गयी हो उसे उसी प्रकार कह । वक्तव्यं तद्वद । तद्वद्धर्मं चर । | इसी प्रकार धर्मका आचरण कर । 'धर्म' यह अनुष्ठान करनेयोग्य धर्म इत्यनुष्ठेयानां सामान्यवचनं | कर्मोंका सामान्यरूपसे वाचक है; क्योंकि सत्यादि विशेष धर्मोंका तो सत्यादिविशेषनिर्देशात् । स्वा- | निर्देश कर ही दिया है । स्वाध्याय CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri