भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

७४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ प्रमादितव्यम् । धर्मशब्दस्यानुष्ठे- | करना चाहिये । 'धर्म' शब्द अनुष्ठेय यविषयत्वादननुष्ठानं प्रमादः स | कर्मविशेषका वाचक होनेसे उसका न कर्तव्यः । अनुष्ठातव्य एव | अनुष्ठान न करना ही प्रमाद है; धर्म इति यावत् । एवं कुशला- | सो नहीं करना चाहिये । अर्थात् दात्मरक्षार्थात्कर्मणो न प्रमदि- | धर्मका अनुष्ठान करना ही चाहिये । तव्यम् । भूतिर्विभूतिस्तस्यै भूत्यै | इसी प्रकार कुशल—आत्मरक्षामें भूत्यर्थान्मङ्गलयुक्तात्कर्मणो न | उपयोगी कर्मोंसे प्रमाद न करे । 'भूति' प्रमादितव्यम् । स्वाध्यायप्रवच- | वैभवको कहते हैं, उस वैभवके लिये नाभ्यां न प्रमादितव्यम् । स्वाध्या- | होनेवाले मङ्गलयुक्त कर्मोंसे प्रमाद योऽध्ययनं प्रवचनमध्यापनं | न करे । स्वाध्याय और प्रवचनसे ताभ्यां न प्रमादितव्यम् । ते हि | प्रमाद न करे । स्वाध्याय अध्ययन है नियमेन कर्तव्ये इत्यर्थः ॥ १ ॥ | और प्रवचन अध्यापन, उन दोनोंसे तथा देवपितृकार्याभ्यां न | प्रमाद न करे अर्थात् उनका नियम- प्रमादितव्यम् । दैवपित्र्ये कर्मणी | से आचरण करता रहे ॥ १ ॥ इसी कर्तव्ये । | प्रकार देवकार्य और पितृकार्योंसे भी | प्रमाद न करे, अर्थात् देवता और | पितृसम्बन्धी कर्म अवश्य करने | चाहिये । मातृदेवो माता देवो यस्य स | मातृदेव—माता है देव जिसका त्वं मातृदेवो भव स्याः । एवं | वह तू मातृदेव हो । इसी प्रकार पितृदेव आचार्यदेवो भव । | पितृदेव हो, आचार्यदेव हो, [ अतिथि- देवतावदुपास्या एत इत्यर्थः । | देव हो ] [ इनका अर्थ समझना यान्यपि चान्यान्यनवद्यान्यनि- | चाहिये ] । तात्पर्य यह है कि ये न्दितानि शिष्टाचारलक्षणानि | सब देवताके समान उपासना कर्माणि तानि सेवितव्यानि | करनेयोग्य हैं । इसके सिवा और कर्तव्यानि त्वया । नो न कर्त- | भी जो अनवद्य—अनिन्द्य यानी | शिष्टाचाररूप कर्म हैं तेरे लिये वे ही | सेवनीय यानी कर्त्तव्य हैं । अन्य

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri