भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

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आ. ७ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ७३ भुवनों की संख्या अठाइस है। शुद्ध विद्या में पाँच भुवन हैं१ और ईश्वर तत्त्व में विद्येशाष्टक भुवन हैं। सादाख्य तत्त्व में पाँच भुवन है—इस प्रकार शान्ता कला में अठारह भुवन हैं२। इस प्रकार सब अध्वाओं को शरीर, प्राण, और परम आकाश-कल्प संवित् में उनकी परम स्थिति को जानकर और पूर्णता को प्राप्त कर भैरव भाव खुल जाता है। परमेश्वर के शास्त्रों के द्वारा सुनिरूपित सुविमल सब अध्वाओं को बुद्धि, आकाश, शरीर, प्राण और संवित् में देखता हुआ मनुष्य परमेश्वर का ही दर्शन करता है। इति आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा रचित तन्त्रसार का देशाध्वा।


ये तीन काल में, और माया में महातेज, वाम, भव, उद्भव, एकपिङ्गल, ईशान, भुवनेश, अंगुष्ठ। १. विद्या में हालाहल, रुद्र, क्रोध, अम्बिका, अघोरा वामदेवी आदि हैं। २. इस प्रकार निवृत्ति कला में १६ भुवन, प्रतिष्ठा में ५६, विद्या में २८, शान्ति में १८, कुल ११८ भुवन हैं, परन्तु शान्त्यतीत कला में कोई भुवन नहीं है।