तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ९९ रूपी वस्तु को देख कर परिपूर्णता आती है जैसे नृत्य करने वाली के नृत्य को देखने के समान उसी नील का जो स्वरूप प्रमाता में विश्रान्त रहता है उसके उसी रूप में स्वप्रकाश विमर्श का उदय होता है—अतः पृथिवी से प्रधान तक तत्त्वों की पंचदशात्मकता सिद्ध होता है। जिन प्रमाताओं में राग आदि कंचुकों की जागरुकता आ जाती है उन सकल अर्थात् कला से युक्त प्रमाता में वेद्यधर्मता आने के कारण उनमें भी पंचदशता रहती है। इस विषय का विस्तृत विवरण तंत्रालोक में वर्णित किया गया है। पुरुष से लेकर कलातत्त्व तक तत्त्वों का स्वरूप तेरह हैं—सकल आत्मा की प्रमातृता रहने के कारण उसमें शक्ति और शक्तिमान् इन दो रूप प्रत्यस्तमित हो जाते हैं, उस सकल आत्मा में केवल स्वरूप ही स्थित रहता है। प्रलयाकल आत्मा का स्वरूप को लेकर और पाँचों को प्रमाता के रूप में ग्रहण करने पर शक्ति शक्तिमान के भेद ग्यारह होते हैं। उसी प्रकार विज्ञानाकल के स्वरूप को लेकर और बाकी चारों को प्रमाता के रूप में ग्रहण करने पर नौ भेद हैं। मन्त्र के स्वरूप को लेकर तीनों को प्रमाता के रूप में ग्रहण करने पर सात भेद हैं। मन्त्रेश्वर के स्वरूप को लेकर और दो को प्रमाता के रूप में ग्रहण करने पर पाँच भेद हैं। मन्त्र- महेश्वर के स्वरूप को लेकर एकमात्र परमेश्वर को प्रमाता के रूप में ग्रहण करने पर शक्ति तथा शक्तिमान के भेद से तीन भेद हैं। शिव जो एकमात्र प्रकाश तथा चैतन्यमय और स्वातन्त्र्य-निर्भर हैं उसमें कोई भेद नहीं है क्योंकि वे परिपूर्ण-स्वभाव हैं। इस प्रकार तत्त्वों के जो भेद 'परमेश्वरानुत्तरनयैक' नामक ग्रंथ में निरूपण किये गये हैं वही भुवनों के भेद-हेतु नाना विचित्रता के कारण बनते हैं; क्योंकि नरक, स्वर्ग और रुद्र के भुवनों की पार्थिवता समान होने पर भी दूर में स्थित स्वभाव के जो भेद हैं वही उसका कारण बतलाया गया है। इस विषय में परस्पर भेदों की गणना होने पर कितने अवान्तर भेद होते हैं कौतहूली पाठक इसे जानने के लिए तन्त्रालोक से जान लें। अतः एक-एक घंटे के अनुसरण के द्वारा भी पृथ्बी आदि तत्त्वों के भेद का निरूपण हुआ है। अब समग्र पृथ्वी तत्त्व जो प्रमाता और प्रमेय रूप है उसके सम्बन्ध में निर्देश किया जा रहा है। जो प्रकाश धरातत्त्व के साथ अभिन्न रूप