भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १३५ प्रकार अभीष्ट देनेवाला बनता हैं। यह एक सार्थक नाम क्योंकि रुद्र- शक्तियों के द्वारा इन मालाओं का धारण होता है फलों की प्राप्ति कराने में यह पुष्प के समान बनती है तथा संसाररूपी हिमों का नाश करती है और नादरूपी भ्रमरी बनकर सिद्धि तथा मोक्ष के रूप धारण करती है। यह दान और आदान उभय प्रकार शक्तियों से सम्बन्धित है, क्योंकि 'र' और 'ल' की अभिन्नता शास्त्रों में कथित हुआ है। इसलिए जो मन्त्र विधिभ्रष्ट है इस न्यास के द्वारा पूर्ण बन जाता है। मलिन गारुड तथा वैष्णव मन्त्रादि निर्मल बनकर मोक्ष देनेवाले बनते हैं। शरीर में न्यास के अनन्तर अर्धपात्र में यही न्यास करना चाहिए। इस विषय में क्रिया और कारकों का परमेश्वर के साथ अभिन्नताबोध की दृढ़ता की सिद्धि के लिए पूजनरूपी क्रिया का उदाहरण उपस्थित किया गया है। पूजनक्रिया में सभी कारकों का इस उपाय से परमेश्वर का स्वरूप प्राप्त होता है। इस विषय में यज्ञकर्ता के द्वारा अधिकरण रूपी स्थानशुद्धि के द्वारा, अपादान और करण अर्धपात्रशुद्धि और न्यास के द्वारा, यज्ञकर्ता (कर्तृ कारक) का देहन्यास के द्वारा, याज्य जो कर्म है स्थण्डिलादि न्यास के द्वारा सम्पन्न होता है। इस प्रकार विभिन्न प्रकार क्रियाओं से सभी कारकों का परमेश्वर स्वरूप की प्राप्ति होती है। इस दृष्टि से सब प्रकार क्रियाओं को देखने पर प्रमुख ज्ञान और योगरूपी उपायों के बिना ही जीव परमेश्वर का स्वरूप प्राप्त करता है। अर्धपात्र में इसी प्रकार न्यास के अनन्तर फूल और धूपों से उसके पूजन के १. कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण ये छः कारक हैं। पूजक के द्वारा जो भी क्रियायें सम्पन्न होते हैं वे सभी शिव से अभिन्न हैं। निखिल कारकों का सन्निवेश पूजन क्रिया में स्थित है, अतः पूजनक्रिया में शिवाभिन्नता सिद्ध हो जाने पर पूजक की लौकिक क्रियायें जैसे गमनादि भी शिवाभिन्न सिद्ध होने लगती हैं। शिवभावना से भावित होकर पूजनकर्ता न्यास तथा अर्चन आदि क्रियाएँ जैसे-जैसे करते रहते हैं तब धीरे-धीरे उनके चित्त में लौकिक क्रियाओं में जो द्वैतबोध वर्तमान है वह कटने लगता है और किसी समय समग्र विश्व अकस्मात् शिवमय उद्भास से भर जाता है। न्यास, जप, अर्चन आदि यद्यपि क्रियारूप हैं तो भी शिवभावना अर्थात् सभी क्रियाएँ शिव का ही स्वरूप हैं इस प्रकार भावना से सम्पन्न होने पर क्रियाएँ भी उत्कृष्ट फल प्रदान करती हैं।