तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ वक्त्र है, अधोभाग में पाताल वक्त्र है, पूर्व आदि चार दिशाओं में क्रमशः तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात तथा वामदेव सम्बन्धी मुख हैं। इन चारों के बीच में अन्य चार हैं¹—इस प्रकार संवित् ही अपनी महिमा से मूर्तियों के भेद से दिशाओं के भेदों को प्रकाशित करती है। अतः दिक् कोई अलग तत्त्व नहीं है। अपने शरीर की छाया लाँघने की इच्छा होने पर भी वह जैसे सामने ही रह जाती है उसी प्रकार परमेश्वर मध्य में ही स्थित रहते हैं। सभी वस्तुओं का अधिष्ठातृत्व हो माध्यस्थ्य है ऐसा कहा जाता है। इसी प्रकार भगवान् जैसे दिशाओं के भेदों को उत्पन्न करने वाले होते हैं सूर्य भी उसी प्रकार है।² सूर्य स्वयं परमेश्वर सम्बन्धी ज्ञानशक्ति है ऐसा विभिन्न स्थानों में वर्णित हुआ है। इस ज्ञानशक्ति की अभिव्यक्ति जहाँ पहले होती है वह पूर्व है जहाँ सूर्य भी वहाँ है। इस सिद्धान्त के अनुसार पूर्व आदि दिशा आत्माधीन है इसलिए स्वसम्मुख देश का ही नाम पूर्व है। अतः निजी आत्मा, सूर्य और परमेश्वर इन त्रितय की एकात्मकभावना के द्वारा दिशा सम्बन्धी विचार होना चाहिए—यही श्री अभिनवगुप्त के गुरुओं का सिद्धान्त है। इस स्थिति के अनुसार उत्तराभिमुख होकर³ बैठ कर देहरूपी पुर्यष्टक आदि में अहं भाव (अहं अभिमान) को छोड़कर देहस्वरूप को जला देना चाहिए। जैसे दूसरे का देह निकट रहने पर उसमें १. ऊर्ध्व और अधः को छोड़कर अग्नि, नैऋत, वायु और ईशान जो क्रमशः पूर्व-दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम-उत्तर, उत्तर-पूर्व आदि दिशाएँ हैं ये मध्यरूपी परप्रकाश के सम्बन्ध से उदित होती हैं। जिसे माध्यस्थ्यरूप में वर्णित किया गया है वह सब दिशाओं का ही नहीं सभी के ही आधार हैं, वे प्रकाश-ही-प्रकाश है, किसी का प्रकाश्य नहीं बनते । २. शास्त्रीय दिग्विभाग जैसे प्रकाशरूपी शिव पर आश्रित है उसी प्रकार लौकिक दिग्विभाग भी सूर्य पर आश्रित है। ज्ञानशक्ति ही आदित्य-विग्रह के रूप में आकाश में भासमान है। सूर्य के द्वारा दिग्विभाजन निम्न उपाय से किया जाता है। विषुवत् दिन में जब दिन और रात समानकाल-स्थायी होते हैं उस दिन सूर्य जिस दिशा में स्थित रहता है वही पूर्व-दिशा है। ३. परमेश्वर जो मध्यस्थित हैं उन्हें ग्रहण करने की इच्छा से पूजक जिस दिशा की ओर बैठते हैं वह दक्षिण है। उसका पिछला भाग ही उत्तर है।