भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

आ. १८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १७३ अनन्तर मन्त्र और देवता की तदात्मता की सिद्धि के लिए छः महीने तक प्रतिदिन जप, हवन और विशेषपूजा रूपी विद्याव्रत का अनुष्ठान उसे करना चाहिए ।' इसके अनन्तर मन्त्र और देवता सम्बन्धी तन्मयीभाव सम्पन्न हो जाने पर उसे दीक्षा आदि कृत्यों में अधिकार आता है । इस दीक्षा कार्य में अयोग्य मनुष्य को दीक्षा न देनी चाहिए । न तो योग्य व्यक्ति का परिहार करना चाहिए । जो दीक्षित है उसे ज्ञान प्रदान करते समय उसकी परीक्षा होनी चाहिए । जिसने गुप्त रूप से ज्ञान प्राप्त कर लिया है उसके विषय में गुरु को वैसा जानकर उसकी उपेक्षा करनी चाहिए । इस अभिषेक के कार्य में जिसकी जैसी शक्ति है देवता का पूजन भी उसी प्रकार होना चाहिए । ज्ञान का अभ्यास जिसमें हो चुका है और अपने और दूसरों में ज्ञान के संक्रमण करने के अधिकार रखने वाले साधक ही गुरु होने की योग्यता प्राप्त करता है इसलिए ऐसे पुरुष का ही अभिषेक होना चाहिए । इति श्री अभिनवगुप्त के द्वारा रचित तन्तसार के अभिषेक प्रकाशन नाम का अठारह आह्निक है । ऐसे मनुष्य जगत् में दुर्लभ हैं। उनके दर्शन स्पर्शन, उनसे आलापन, उनकी कृपादृष्टि दूसरों पर पड़ने से मनुष्य निष्पाप हो जाते हैं। उनसे दीक्षा मिलने पर मनुष्य परमपद प्राप्त करते हैं। गुरु जो कर्मी है, ज्ञानी नहीं अगर वह अपने अधिकार समर्पित करने के बाद दीक्षा आदि कार्यों से विरत रहते हैं तो उसे किसी प्रकार अपराध का दोष नहीं लगता है। लेकिन अभिषिक्त होने के पहले उसे अधिकार रूप बन्धन था। क्यों कि भोग जैसा बन्धन है अधिकार भी उसी प्रकार बन्धन है। गुरु दीक्षा के द्वारा शिष्य को विद्येश्वर पद में पहुँचाते हैं, यह उनका अधिकार है अगर वे दीक्षा आदि कार्यों से विरत रहते हैं तो अधिकार भंग रूप अपराध उसे लगता है । १. जिन्होंने अभिषेक प्राप्त कर लिया है वे दो वर्गों में बाँटे जाते हैं—एक आचार्य है, और दूसरा साधक है । आचार्य दीक्षा आदि कार्यों में अधिकार रखते हैं लेकिन साधक सिद्धि की कामना रखते हैं। इसलिए दोनों को अभिषेक प्राप्त होने पर भी अधिकार की भिन्नता है ।