भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

उन्नीसवाँ आह्निक निम्नकोटि के शास्त्र के अनुसार में स्थित १ गुरु तक सभी मनुष्यों की मृत्यु के अनन्तर उनपर शक्तिपात हो जाने के कारण ही आचार्य को मृत मनुष्य के लिए कथित दीक्षा विधि के अनुसार अन्त्येष्टि दीक्षा करनी चाहिए। केवल इतना ही नहीं जो लोग ऊर्ध्वशासन अर्थात् शिवाद्धय शासन में स्थित हैं लेकिन आचारभ्रष्ट हो गये हैं और प्रायश्चित्त न कर मर गये हैं ऐसे लोगों के लिए भी यह अन्त्येष्टिदीक्षा का अनुष्ठान करना चाहिए। यह परमेश्वर की आज्ञा है। इस विषय में यह ज्ञातव्य है कि मृत मनुष्य के उद्धार के लिए जो विधि का उल्लेख हुआ है वे सभी शवशरीर में करणीय है। शरीर का दाहसंस्कार पूर्णाहुति से करना चाहिए। जो लोग अज्ञ हैं उनमें विश्वास दिलाने के लिए सप्रत्ययात्मिका अन्त्येष्टि२ क्रिया, ज्ञान और योगबल से करनी चाहिए। १. इस सिद्धान्त के अनुसार वैष्णवादि शास्त्रों के अनुगामी सभी लोग निम्न- कोटि के अनुशासन के अन्तर्गत हैं। मृत्यु के अनन्तर अगर उनमें शक्तिपात हुआ हो तो आचार्य उनके दाहसंस्कार के समय अन्त्येष्टिदीक्षा प्रदान करते हैं। इस प्रकार दीक्षा केवल उन्हीं को नहीं अपितु जो लोग अद्वय शिवमार्ग में स्थित हैं लेकिन किसी कारण वश आचारभ्रष्ट हो गये हैं उनके लिए भी इस प्रकार दीक्षाविधि प्रचलित थी। २. शवशरीर में उन सब क्रियाओं का अनुष्ठान आवश्यक हैं मृतोद्धार के लिए कुश या गोबर से बनी मूर्ति में उनका अनुष्ठान किया जाता है। जो लोग इस प्रकार अनुष्ठान में विश्वास नहीं रखते हैं उन्हें विश्वास दिलाने के लिए आचार्य क्रिया, ज्ञान और योग बल से अर्थात् उस जीव को महाजाल प्रयोग के द्वारा आकर्षित करते हुए आचार्य अपने हृदय में उसे स्थापित कर दें। इसके अनन्तर कुछ प्रक्रियाओं से उसकी सत्ता से अपनी सत्ता की अभिन्नता लावे इसके बाद मध्यममार्ग से ब्रह्मरंध्र तक पहुँचकर स्वाभाविक स्पन्द को प्राप्त करें, जीव की सोलह कलाओं पर अपना अधिकार स्थापित कर उसको अपने के साथ अभिन्न बनावे। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप शव का शरीर काँपने लगता है या उसका बाया हाथ ऊपर उठ जाता है।