भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

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१७८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १९ अनुष्ठान आवश्यक है। जो लोग मुक्ति का इच्छुक है वह भी परमेश्वर के साथ तदात्मता की सिद्धि के लिए अपने जोवनकाल में प्रतिदिन इनका अनुष्ठान अभ्यस्त क्रिया के समान करें। जो लोग तत्त्वज्ञानी हैं उनके लिए अन्त्येष्टि से लेकर श्राद्ध तक इन विधियों का कोई उपयोग नहीं है। उनका प्रयाण का दिन उनसे जिन लोगों ने विद्या प्राप्त की है उन विद्यासन्तानों का पर्वदिन है। १ क्योंकि पर्वदिन ही संविद् रूप अंश को पूर्ण करता है। सभी सन्तानों का संवित्, ही एकमात्र परमार्थ है इसलिए जीवित अवस्था में ज्ञानलाभरूपी सन्तान प्राप्ति का दिन जैसे एक पर्वदिन है। इस श्राद्ध आदि विधि में मूर्तियाग ही मुख्य है—श्री सिद्धा तन्त्र का यही सिद्धान्त है। मूर्तियाग की विधि नैमित्तिक प्रकाशन नामक अंश में बतलायेंगे। शिव अनुग्रह परायण हैं। वे अनुग्रह से विवश होकर जिसे अनुग्रह करते हैं वही परमेश्वर स्वरूप को प्राप्त करता है—यह कितना अद्भुत है। उन परमेश्वर की इच्छा से ही उपायों की कल्पना हुई है, ऐसा जानकर ज्ञानी मनुष्य परिमित उपायों को ग्रहण करते हुए भी किसी प्रकार शंका का अनुभव नहीं करते हैं। इति श्री अभिनवगुप्त द्वारा रचित तन्त्रसार के श्राद्धदीक्षा प्रकाशन नाम का उन्नीसवाँ अध्याय है। १. गुरु का तिरोधान दिवस विशेष पर्व का दिन है क्योंकि उसी दिन परमेश्वर के साथ उनका सायुज्य प्राप्त हुआ था। उस पर्वदिन में उनसे दीक्षाप्राप्त सभी, उनकी पत्नी, पुत्र आदि उनके सायुज्य के स्मरण से और पर्वदिन में विहित अनुष्ठान से बोध की पूर्णता प्राप्त करते हैं। जैसे तिरोधान का दिन पर्व के दिन के रूप में माना जाता है वैसा ही उनका जन्मदिवस भी उनकी शिष्य आदि सन्तानों के लिए पर्व का दिन है।