भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187

योगित्वं साध्यव्यापकत्वम्। साधनवनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वं साधनाव्यापकत्वम्। पर्वतो धूमवान् वह्निमत्त्वादित्यत्रार्द्रेन्धनसंयोग उपाधिः। यत्र धूमस्तत्रार्द्रेन्धनसंयोग इति साध्यव्यापकता। यत्र पदकृत्यम् वारणाय व्यापकत्वशरीरेऽप्यत्यन्तपदमादेयम्। साधनभेदमादाय साधनस्यो- पाधित्ववारणायाव्यापकत्वशरीरेऽप्यत्यन्तपदमवश्यं देयम्। सोऽयमुपाधिस्त्रिविधः—केवलसाध्यव्यापकः पक्षधर्मावच्छिन्नसाध्यव्या- पकः साधनावच्छिन्नसाध्यव्यापकश्चेति। तत्राद्य उपदर्शितः। एवं क्रत्वन्तर्व- र्तिनी हिंसा अधर्मजनिका हिंसात्वात् क्रतुबाह्यहिंसावदित्यत्र निषिद्धत्व- मुपाधिः। तस्य यत्राधर्मजनकत्वं तत्र निषिद्धत्वमिति साध्यव्यापकता। यत्र हिंसात्वं तत्र न निषिद्धत्वमिति निषिद्धत्वमुपाधिः साधनाव्यापकः, क्रतुहिं- सायां निषिद्धत्वस्याभावात्। ‘न हिंस्यात्सर्वाणि (सर्वा) भूतानि’ इति सामान्यवाक्यतः ‘पशुना यजेत’ इत्यादिविशेषवाक्यस्य बलीयस्त्वात्। अतो हिंसात्वं नाधर्मजनकत्वे प्रयोजक मपि तु निषिद्धत्वमेवेत्यादिकमपि द्रष्टव्यम्। द्वितीयो यथा—वायुः प्रत्यक्षः प्रत्यक्षस्पर्शाश्रयत्वादित्यत्रोद्भूतरूपवत्त्व- मुपाधिः। तस्य यत्र प्रत्यक्षत्वं तत्रोद्भूतरूपवत्त्वमिति न केवलसाध्यव्याप- कत्वं, रूपे व्यभिचारात्, किन्तु द्रव्यत्वरूपो यः पक्षधर्मस्तदवच्छिन्नबहिःप्रत्य- क्षत्वं यत्र, तत्रोद्भूतरूपवत्त्वमिति पक्षधर्मावच्छिन्नसाध्यव्यापकत्वमेव। हिन्दी धिका भेद रह जानेसे वह उपाधि साध्यसमानाधिकरणभेदका प्रतियोगी ही हो जायगा और वह साध्यव्यापक नहीं हो सकेगा। अतः व्यापकत्वशरीरमें अत्यन्ताभावका निवेश आवश्यक है। ऐसे ही "साधनाव्यापकत्वम्" यहाँ भी अव्यापकत्वस्वरूपमें केवल अभाव न कहकर अत्यन्ताभावका निवेश आवश्यक है; अन्यथा "पर्वतो धूमवान् वह्नेः" इत्यादि स्थलमें सर्वत्र साधन ही उपाधि बन जायगा। क्योंकि वह्निहेतु धूमरूप- साध्यका व्यापक भी है और वह्न्यधिकरणमें वह्निका अत्यन्ताभाव न होनेपर भी वह्निका भेद तो रहेगा ही। अतः वह्निसमानाधिकरणभेदकी प्रतियोगिता वह्निमें होनेसे स्वयं वह्नि ही वह्निका अव्यापक भी हो जायगा। इस प्रकार सर्वत्र सोपाधिक स्थलमें साधन ही उपाधि होने लगेगा। जो असंगत है। असंगत इसलिए है कि उपाधिके व्यभिचारसे हेतुमें साध्यके व्यभिचारका अनुमान कराना उपाधिका प्रयोजन है, वह नहीं हो सकेगा। क्योंकि यदि हेतु ही उपाधि हो तो उसीका व्यभिचारी वही नहीं होता है, अतः वह साध्यके व्यभिचारका अनुमान कैसे करा सकेगा ?