भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ४३ न्यायबोधिनी त्वम् । साहचर्यं (नाम) सामानाधिकरण्यम् । तथा च धूमनियतवन्हिसामा- नाधिकरण्यं व्याप्तिरित्यर्थः । अत्र वन्हेर्धूमव्यापकत्वं नाम धूमसमानाधिक- रणात्यन्ताभावप्रतियोगितानवच्छेदकधर्मवत्त्वम् । तथाहि धूमाधिकरणे पर्वतचत्वरमहानासादौ वर्तमानो योऽभावः, घटत्वाद्यवच्छिन्नप्रतियोगिताकः, न तु वह्नित्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावः, कुत ? पर्वतादौ वह्नेः सत्त्वात् । एवं सति धूमाधिकरणे पर्वतचत्वरादौ वर्तमानस्य घटाद्यभावस्य प्रतियोगि- तावच्छेदकं घटत्वादिकमनवच्छेदकं वह्नित्वं, तद्वत्त्वं वह्नौ वर्ततेऽतो धूम- व्यापकत्वं वह्नौ वर्तते । तथा च धूमव्यापकवह्निसामानाधिकरण्यं व्याप्तिरिति फलितमिति । इयमन्वयव्याप्तिः सिद्धान्तानुसारेण । पूर्वपक्षव्याप्तिस्तु साध्याभाववदवृत्तित्वम् । साध्यतावच्छेदकसम्बन्धाव- च्छिन्नसाध्यतावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोगिताक-प्रतियोगितावच्छेदकसम्बन्धा- हिन्दी-कला तथा साहचर्य का अर्थ है 'सामानाधिकरण्य' (एक अधिकरण में रहना) । अतः 'नियतसाहचर्य' पद से धूमनियत (व्यापकीभूत) वह्नि के साथ धूम का सामानाधि- करण्य अर्थात् एक अधिकरण में रहना व्याप्ति है । वह्नि में धूम की व्यापकता क्या है, इसे न्यायबोधिनीकार बताते हैं—"धूम- समानाधिकरण जो अत्यन्ताभाव, उसकी प्रतियोगिता का अनवच्छेदक जो धर्म, तादृशधर्मवत्ता (तादृश धर्मवाला होना)" यही धूम की वह्नि में व्यापकता है । अर्थात् धूमाधिकरण पर्वत-चत्वर-(चौराहा) महानस आदि में वर्तमान जो अभाव, वह घटत्वादि से अवच्छिन्न-प्रतियोगिता का निरूपक अभाव घटादिका अभाव होगा, न कि वह्नित्वादि से अवच्छिन्न-प्रतियोगिता वाला वह्न्याद्यभाव होगा । क्योंकि धूमाधिकरण पर्वतादि में तो वह्नि की सत्ता ही है । इस स्थिति में धूमाधिकरण पर्वत-चत्वरादि में वर्तमान घटादि के अभाव की प्रतियोगिता घट में गई और उस प्रति- योगिता का अवच्छेदक घटत्वादिक हुआ तथा अनवच्छेदक वह्नित्वधर्म हुआ । एवं तादृशानवच्छेदक धर्मवत्त्व वह्नि में है। अतः धूम की व्यापकता वह्नि में है। इस प्रकार मूलोक्त 'नियतसाहचर्यं' पद से "धूम (हेतु) व्यापक वह्नि (साध्य) सामा- नाधिकरण्य व्याप्ति है" यह फलितार्थ हुआ । अन्वयव्याप्ति का यह स्वरूप सिद्धान्त- पक्ष के अनुसार है । पूर्वपक्ष की व्याप्ति तो "साध्याभाववदवृत्तित्वम्" है, जिसे व्याप्तिपञ्चक ग्रन्थ में प्रतिपादित किया गया है। नव्यन्याय की भाषा में इसका विशद रूप यह है- साध्यतावच्छेदक संयोगादिसम्बन्ध से अवच्छिन्ना तथा साध्यतावच्छेदकीभूत वह्नित्वादि- धर्म से अवच्छिन्ना जो वह्न्यादिसाध्यनिष्ठा प्रतियोगिता, तादृश प्रतियोगिता-