तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलितः ४५ गतस्तद्गते चाग्नौ सन्दिहानः पर्वते धूमं पश्यन् व्याप्तिं स्मरति— 'यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निः' इति । तदनन्तरं वह्निव्याप्यधूमवानयं पर्वत इति ज्ञानमुत्पद्यते, अयमेव लिङ्गपरामर्श इत्युच्यते । तस्मात् पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानमनुमितिरुत्पद्यते । तदेतत्स्वार्थानुमानम् । यत्तु स्वयं धूमादग्निमनुमाय परं प्रति बोधयितुं पञ्चावयव- वाक्यं प्रयुज्यते तत्परार्थानुमानम् । यथा पर्वतो वह्निमान्, धूम- वत्त्वात्, यो यो धूमवान्स स वह्निमान्, यथा महानसम्, तथा चायम् तस्मात्तथेति । अनेन प्रतिपादिताल्लिङ्गात्परो- ऽप्यग्निं प्रतिपद्यते । धूम और अग्नि की व्याप्ति को जान कर पर्वत के समीप गया और वहाँ पर्वत के अन्दर अग्नि के होने में सन्देह करता हुआ पर्वत में धूम को देखकर व्याप्ति का स्मरण करता है कि "जहाँ जहाँ धूम है, वहाँ वहाँ अग्नि है"। उसके बाद उसे 'वह्नि- की व्याप्ति से युक्त धूमवाला यह पर्वत है" ऐसा ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । यही ज्ञान लिङ्गपरामर्श नाम से कहा जाता है । अनन्तर उस परामर्श से 'अयं पर्वतो वह्नि- मान्' ऐसा अनुमितिरूप ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । यह स्वार्थानुमान है । जो तो स्वयं धूम से अग्नि का अनुमान करके दूसरे को अग्नि का ज्ञान कराने के लिये पञ्चावयव वाक्य का प्रयोग किया जाता है, वह परार्थानुमान है । जैसे, 'पर्वतो वह्निमान्' यह प्रथम अवयववाक्य है, 'धूमवत्त्वात्' यह द्वितीय अवयववाक्य है, "यो यो धूमवान् स स वह्निमान् यथा महानसम्" यह तृतीय अवयववाक्य है, "तथा चायम्" यह चतुर्थ अवयववाक्य है, "तस्मात्तथा" यह पञ्चम अवयववाक्य है । इस पञ्चावयव वाक्य से ज्ञापित धूमरूपलिङ्ग से दूसरा व्यक्ति भी पर्वत में अग्नि का निश्चय कर लेता है । न्यायबोधिनी न्यायत्वं च प्रतिज्ञाद्यवयवपञ्चकसमुदायत्वम् । अवयवत्वं च प्रतिज्ञा- द्यन्यतमत्वम् । हिन्दी-कला है । अर्थात् जिसमें प्रतिज्ञादि का प्रयोग किया जाय, वह परार्थानुमान है । अपने लिये किये गये अनुमान में प्रतिज्ञादि-वाक्यों का प्रयोग नही करना पड़ता है । किन्तु दूसरे को अवगत कराने के लिये प्रतिज्ञादि-वाक्यों का प्रयोग करना ही पड़ता है । प्रतिज्ञा आदि पाँच अवयवों के समुदाय को न्याय कहते हैं । यहाँ अवयव का अर्थ है— प्रतिज्ञा-हेतु-उदाहरण-उपनय और निगमन का अन्यतम (एक-एक) । इन दोनों अनुमानों का तथा पञ्चावयवों का सोदाहरण निरूपण मूल में स्पष्ट है ।