भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 199 में से

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अथ शब्दपरिच्छेदः आप्तवाक्यं शब्दः । आप्तस्तु यथार्थवक्ता । वाक्यं पदसमूहः, यथा—गामानयेति । शक्तं पदम् । अस्मात्पदादयमर्थो बोद्धव्य इतीश्वरसङ्केतः शक्तिः । आप्तजन का वाक्य शब्द-प्रमाण है । जो यथार्थ ( सत्य ) बोले, वह आप्त है । पदों के समूह को वाक्य कहते हैं, जैसे - ‘गाम् आनय’ इत्यादि वाक्य है । क्योंकि यहाँ पर ‘गाम्’ यह सुबन्त-पद और ‘आनय’ यह तिङन्त-पद एक साथ प्रयुक्त हैं । पदार्थ का बोध कराने में जो शक्तिमान् है, उसे पद कहते हैं । “इस पद से इस अर्थ का बोध करना चाहिये” इस प्रकार का ईश्वरीय-संकेत शक्ति है । न्यायबोधिनी शब्दं लक्षयति—आप्तेति । आप्तोच्चरितत्वे सति वाक्यत्वं शब्दस्य लक्षणम् । ( प्रमाणशब्दत्वं लक्ष्यतावच्छेदकम् ) । वाक्यत्वमात्रोक्तावनाप्तो- च्चरितवाक्येऽतिव्याप्तिरत आप्तोच्चरितत्वनिवेशः तावन्मात्रोक्तौ जबगड- दशादावतिव्याप्तिरतो वाक्यत्वम् । आप्तत्वं च प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञान- वत्त्वम् । तथा च प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानजन्यशब्दत्वमिति पर्यवसन्नोऽर्थः । वस्तुतस्तु पदज्ञानं करणम् । वृत्तिज्ञानसहकृतपदज्ञानजन्यपदार्थोपस्थि- हिन्दी-कला ‘आप्तोच्चरितत्वे सति वाक्यत्व’ शब्दप्रमाण का लक्षण है । यहाँ केवल शब्द लक्ष्य नहीं है, किन्तु प्रमाणशब्द लक्ष्य है और प्रमाणशब्दत्व लक्ष्यता का अवच्छेदक है । यदि केवल वाक्यत्व शब्दप्रमाण का लक्षण माना जाय तो अनाप्तजन से उच्चारित शब्द में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः आप्तोच्चरितत्व-विशेषण दिया । यदि उक्त विशेषणमात्र लक्षण माना जाय और ‘वाक्यत्व’ यह विशेष्यभाग न दिया जाय तो जबगडदश् आदि में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि उक्त सूत्र पाणिनि ( आप्तपुरुष ) से उच्चरित है। किन्तु वाक्यरूप न होने से शब्दप्रमाण के अन्तर्गत नहीं है । आप्त का लक्षण है—प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानवत्त्व । अर्थात् शब्द का प्रयोग यथार्थज्ञान के बाद ही होता है । इसलिये शब्दप्रयोग का हेतु जो यथार्थज्ञान, वह जिसे हो, वह आप्त है। इस प्रकार शब्दप्रमाण का पर्यवसित लक्षण है—प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानजन्य शब्दत्व । उक्त लक्षण प्राचीन मतानुसार है । नव्यों के अनुसार तो पद करण नहीं होता किन्तु पदज्ञान ही शाब्दबोध का करण होता है । इसलिये इस मत में पदज्ञान शब्दप्रमाण है । वृत्तिज्ञानसहकृत