भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ६५ अर्थाबाधो योग्यता । पदानामविलम्बेनोच्चारणं सन्निधिः । तथा च आकाङ्क्षाविरहितं वाक्यमप्रमाणम् । यथा—गौरश्वः पुरुषो हस्तीति न प्रमाणम्—आकाङ्क्षाविरहात् । वह्निना सिञ्च- तीति न प्रमाणम्—योग्यताविरहात् । प्रहरे प्रहरेऽसहोच्चारितानि गामानयेत्यादिपदानि न प्रमाणम्—सान्निध्याभावात् । वाक्यार्थ का बाधित न होना योग्यता है। बिना विलम्ब किये पदों का उच्चारण करना सन्निधि है । इसलिये आकाङ्क्षारहित वाक्य अप्रमाण है। जैसे—"गौः अश्वः पुरुषो हस्ती" यह वाक्य अप्रमाण है, क्योंकि यहाँ पदों में परस्पर आकाङ्क्षा नहीं है । "वह्निना सिञ्चति" यह वाक्य प्रमाण नहीं है, क्योंकि वह्निद्वारा सेचन क्रिया के बाधित होने से वहाँ योग्यता नहीं है । पहर-पहर पर बोले गये, इसीलिये एक साथ नहीं उच्चारित हुए "गाम्—आनय" इत्यादि पद प्रमाण नहीं हैं, क्योंकि इन पदों में सान्निध्य का अभाव है । न्यायबोधिनी सम्बन्धेन अम्-पदं घटपदवदित्याकारक 'अम्'पदविशेष्यकघटपदप्रकारकज्ञान-' सत्त्वे घटीयं कर्मत्वमिति बोधो जायते । अम्-घट इति विपरीतोच्चारणे तु तादृशज्ञानाभावात् तादृशशाब्दबोधो न जायतेऽतस्तादृशाकाङ्क्षाज्ञानं शाब्दबोधे कारणम् । अर्थाबाध इति । बाधाभावो योग्यतेत्यर्थः । अग्निना सिञ्चतीत्यत्र सेककरणत्वस्य जलादिधर्मस्य वह्नौ बाधनिश्चयसत्त्वान्न तादृशवाक्याच्छा- हिन्दी-कला जैसे 'घटम्' इत्यादि स्थल में अव्यवहितोत्तरत्वसम्बन्ध से 'अम्' यह विभक्तिपद 'घट' इस नामपद से विशिष्ट होने के कारण अम्-पदविशेष्यक घटपदप्रकारक ज्ञान होने से 'घटीयं कर्मत्वम्' अर्थात् 'घटगत कर्मता' ऐसा बोध हो जाता है । किन्तु इसके विपरीत 'अम् घट' ऐसा उच्चारण करने पर घटपद के अव्यवहित उत्तर में अम्-पद का ज्ञान नहीं होने से 'घटीयं कर्मत्वम्' यह शाब्दबोध नहीं उत्पन्न होता है । इसलिये उक्त प्रकार का आकाङ्क्षा-ज्ञान शाब्दबोध के प्रति कारण है । विशेष स्पष्टीकरण 'संस्कृत-कला' में द्रष्टव्य है । वाक्यार्थज्ञान के प्रति दूसरा कारण योग्यताज्ञान है । अर्थ में बाध का अभाव योग्यता है । जहाँ अर्थ बाधित होगा, वहाँ शाब्दबोध नहीं होगा । जैसे, 'अग्निना ५