तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)
Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - ६ दर्शनविशुद्धिर्विनयसम्पन्नता शीलव्रतेष्वनतीचारो- ऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधिर्वैयावृत्त्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचन- भक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥२४॥ [ दर्शनविशुद्धिः ] 1- दर्शनविशुद्धि, [ विनयसम्पन्नता ] 2- विनयसम्पन्नता, [ शीलव्रतेष्वनतीचारः ] 3- शील और व्रतों में अनतिचार अर्थात् अतिचार का न होना, [ अभीक्ष्णज्ञानोपयोगः ] 4- निरन्तर ज्ञानोपयोग, [ संवेगः ] 5- संवेग अर्थात् संसार से भयभीत होना, [ शक्तितस्त्यागतपसी ] 6-7- शक्ति के अनुसार त्याग तथा तप करना, [ साधुसमाधिः ] 8- साधुसमाधि, [ वैयावृत्त्यकरणम् ] 9- वैयावृत्त्य करना, [ अर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिः ] 10-13- अर्हत्- आचार्य-बहुश्रुत (उपाध्याय) और प्रवचन (शास्त्र) के प्रति भक्ति करना, [ आवश्यकापरिहाणिः ] 14- आवश्यक में हानि न करना, [ मार्गप्रभावना ] 15- मार्ग प्रभावना और [ प्रवचनवत्सलत्वम् ] 16- प्रवचन-वात्सल्य [ इति तीर्थकरत्वस्य ] ये सोलह भावना तीर्थंकर-नामकर्म के आस्रव का कारण हैं। 90