भारतकोश
तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

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अध्याय - १ एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्यः ॥३०॥ [ एकस्मिन् ] एक जीव में [ युगपत् ] एक साथ [ एकदीनि ] एक से लेकर [ आचतुर्भ्यः ] चार ज्ञान तक [ भाज्यानि ] विभक्त करने योग्य हैं, अर्थात् हो सकते हैं। From one up to four kinds of knowledge can be possessed simultaneously by a single soul. मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च ॥३१॥ [ मतिश्रुतावधयः ] मति, श्रुत और अवधि यह तीन ज्ञान [ विपर्ययश्च ] विपर्यय भी होते हैं। Sensory knowledge, scriptural knowledge and clairvoyance may also be erroneous knowledge. सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥३२॥ [ यदृच्छोपलब्धेः ] अपनी इच्छा से चाहे जैसा ग्रहण करने के कारण [ सत् असतोः ] विद्यमान और अविद्यमान पदार्थों का [ अविशेषात् ] भेदरूप ज्ञान (यथार्थ विवेक) न होने से [ उन्मत्तवत् ] पागल के ज्ञान की भाँति मिथ्यादृष्टि का ज्ञान विपरीत अर्थात् मिथ्याज्ञान ही होता है। 13