तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअभी उन लोगों को विश्राम के लिए लेटे कुछ समय ही बीता था कि एक प्रौढ़ महिला हाथ में घड़ा लिये नदी से पानी लेने के लिए आई। उसने घड़े को पानी में डुबोया तो उसमें जाते पानी की 'गड-गड' ध्वनि से महाराज और तेनाली राम दोनों का ध्यान उस ओर गया। उन दोनों ने नदी की ओर देखा और प्रसन्न हो गए। महाराज ने प्रसन्न होते हुए तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम! तुम्हारा दूसरा अनुमान भी सच साबित हुआ। चलो, महिला से पता करें विजयनगर जाने का रास्ता।” दोनों महिला के पास पहुँचे। महिला ने उन्हें देखते ही समझ लिया कि ये दोनों राजसी व्यक्तित्व के स्वामी हैं। अवश्य इनमें से कोई राजा है। ऐसा सोचकर उसने दोनों को नमस्कार किया और पूछने लगी, “राह भटक गए हो राजन?” महाराज उस महिला की शालीनता से बहुत प्रभावित हुए और महिला से कहा, “हाँ माता! हम दोनों राह भूल गए हैं। जंगल में भटकते-भटकते थक गए हैं और भूखे हैं।” महिला ने उनसे कहा, “कोई बात नहीं, अब तुम दोनों मेरे साथ मेरी झोंपड़ी में चलो। झोंपड़ी में जो कुछ है उससे अपनी भूख मिटाओ। घोड़ों को ले चलकर झोंपड़ी के पास बाँध देना। घोड़ों के चारे की व्यवस्था भी मैं कर दूँगी। सुबह जहाँ कहीं भी जाना है, चले जाना। पल-दो पल में अब सूरज डूब जाएगा। रात हो जाएगी। और जंगल में रात को अनजान राह पर भटकना खतरे से खाली नहीं। कहते हैं कि भी जन्तुओं की शक्ति रात्रि में कई गुना बढ़ जाती है।” महाराज और तेनाली राम के समक्ष उस महिला का प्रस्ताव स्वीकार कर लेने के अलावा कोई चारा नहीं था इसलिए वे दोनों उस महिला के साथ उसकी झोंपड़ी में चले गए। महिला की झोंपड़ी जंगल में बसे एक छोटे गाँव में थी। पाँच-छः परिवारोंवाले इस गाँव में पन्द्रह-बीस लोग ही रहते थे। वन-पत्रों और शिकार पर उनका जीवन आधारित था। महाराज और तेनाली राम दोनों ही भूख से बेहाल थे। महिला ने उन्हें गुड़ और चने के उपयोग से बनाया गया पेठा दिया। महाराज को यह पेठा बहुत स्वादिष्ट लगा। दूसरे दिन सुबह महिला ने उन दोनों को विजयनगर की राह दिखा दी और वे दोनों विजयनगर चले आए। फिर सब कुछ सामान्य हो गया। महाराज और तेनाली राम नियमित राजभवन जाते। वहाँ दोनों में बातचीत होती। एक दिन महाराज ने तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम! मुझे वह पेठा खाने की बड़ी इच्छा है। कहीं से चने-गुड़ के पेठे की व्यवस्था करो।”