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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

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महाराज ने उन्हें स्वीकृति प्रदान कर दी क्योंकि यह खुला मंच था ही राज्य के बाहर से आए अपने-अपने क्षेत्र के महान कलाकारों के लिए या ऐसे कलाकारों के लिए जो अपनी कला के माध्यम से समाज को कोई सन्देश देने का संकल्प लेते हों। अन्ततः विजयनगर का नववर्ष महोत्सव प्रारम्भ हो गया। ऐसा सम्भवतः वर्षों बाद हुआ जब महोत्सव में तेनाली राम शामिल नहीं हुआ। ऐसे सभासद, जो तेनाली राम की विद्वत्ता से ईर्ष्या करते थे, वे भी उसकी अनुपस्थिति का कारण जानने को उत्सुक थे तथा जो उसके प्रशंसक थे, वे भी। महाराज की विवशता थी कि वे तेनाली राम के सन्दर्भ में कुछ कर नहीं सकते थे...बस, उन्होंने अपने खुफिया तंत्र को उसके बारे में पता करने का निर्देश दे दिया था। महोत्सव स्थल पर खुला मंच का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। जब सुन्दर घाटी के कलाकारों का कार्यक्रम आरम्भ हुआ तब उसके संचालक ने एक पंक्ति की घोषणा की, ‘किसी को पतित या कमजोर समझकर उसकी उपेक्षा मत करो क्योंकि ये वैसे लोग हैं जो अभी उठे नहीं हैं।’ रंगमंच से पर्दा हटने पर सबके सामने हरियालियों से सजा एक दृश्य आया। ‘सुन्दर घाटी का यह सौन्दर्य इसकी हरियाली और सुन्दर फूल- पत्तियों के कारण है।’ दृश्य के साथ यह पार्श्व ध्वनि सुनाई पड़ी। पार्श्व ध्वनि में आगे सुना गया, ‘सुन्दर घाटी में बसनेवाले कलाकार सम्पूर्ण धरा को हरियाली से आच्छादित करना चाहते हैं...उनकी चाहत की पवित्रता का परिणाम ही है कि वहाँ लौह दंड के सहारे तपस्या करनेवाले ऋषि को अपनी तपस्या की पूर्णता का भान तब होता है जब उसके तप के प्रभाव से उसके लौह दंड पर भी फूल-पत्ते उग आते हैं। सुन्दर घाटी के कलाकारों का हृदय इतना कोमल और निष्पाप है कि उसके प्रभाव से वहाँ पवित्रता का ढोंग निष्प्रभावी हो जाता है।’ पार्श्व ध्वनि के साथ ही मंच पर एक ऋषि को लौह दंड के सहारे तपस्या करते दिखाया गया और ध्वनि प्रभाव से यह दर्शाया गया कि बहुत वर्ष गुजर गए और ऋषि के लौह दंड में पुष्प खिल गए, हरी-भरी पत्तियाँ आ गईं। तभी वहाँ एक राजा हाथ में लौह दंड लिये आया और संकल्प लियादृ‘जिस तरह ये महर्षि कठोर तप करके अपना जीवन सार्थक कर रहे हैं, उसी तरह मैं भी कठोर तप करके अपना जीवन सार्थक करूँगा।’ और वह राजा उसी महर्षि के पास लौह दंड गाड़कर तपस्या करने लगा। इसके बाद मंच पर तूफान और घनघोर वर्षा का दृश्य पैदा हुआ। राजा और ऋषि इस प्राकृतिक आपदा से बेखबर, तपस्या में लीन रहे। उसके बाद मंच पर अचानक एक दीन-हीन व्यक्ति काँपता हुआ आया। वह वर्षा से भीगा हुआ, कमजोर और बीमार था। वह ऋषि के पास जाकर गिड़गिड़ाया कि वे उसे कहीं सिर छुपाने की जगह बता दें। ऋषि अपनी तपस्या में लीन रहा और जब वह व्यक्ति ऋषि को झकझोरकर उससे सिर छुपाने की जगह बताने के लिए गिड़गिड़ाया तो महर्षि ने उसे धक्का देकर परे ठेल दिया और फिर अपनी तपस्या में लीन हो गया। फिर वह व्यक्ति तपस्या में लीन राजा के पास गया और राजा के पास जाकर गिड़गिड़ाया। राजा ने