तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 118 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यक्ति, परिवेश और परिधान
विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय सिंहासन पर विराजमान थे। सभा में तर्क-वितर्क चल रहा था। सभासद अपनी-अपनी बुद्धि और वाक्पटुता से यह प्रमाणित करने में लगे थे कि व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वह सृष्टि की विशिष्ट रचना है। प्रकृति में एक से बढ़कर एक जन्तु हैं। कोई बहुत छोटा तो कोई बहुत विशाल। कोई अकेला विचरण करता है तो कोई समूह में। कोई इतना शक्तिशाली है कि बड़ा पेड़ उखाड़ डालता है। किसी को पेट भरने के लिए सरसों का एक दाना काफी है और किसी को अपना पेट भरने के लिए किसी बड़े जानवर का शिकार करना पड़ता है। इतनी विचित्रतापूर्ण सृष्टि में एक मनुष्य ही है जिसने अपनी बुद्धि से इन सहस्त्रो कोटि के जीवों की प्रकृति को समझा है और उनसे लाभ लेने की कला में पारंगत हुआ है। हिंस्र जानवर शेर को भी उसने अपनी मेधा के बूते पालतू बना लिया है। वह हाथी जैसे विशालकाय जीव पर सवारी करता है।
बात व्यक्ति की क्षमता से होते हुए उसके आचार-व्यवहार पर उतर आई। तर्क-वितर्क का दौर जारी रहा। महाराज कृष्णदेव राय अपने आसन पर बैठे अपने सभासदों की वाक्पटुता और उनके ज्ञान का आनन्द उठा रहे थे। महाराज का एक सभासद अपने आसन पर निर्लिप्त भाव मंे बैठा था। उसे देखकर ऐसा नहीं लगता था कि वह सभा में चल रही चर्चा के दौर में कोई रुचि रखता हो। महाराज कृष्णदेव राय उसकी ओर कई बार देख चुके थे। उसकी निर्लिप्तता बनी हुई थी। महाराज ने सोचा-शायद वह किसी अन्य विषय पर विचार कर रहा है। उन्होंने उसे टोका नहीं। सभा में अब सभासद कुछ और बुलन्दी से बोलने लगे थे।
एक सभासद ने कहा, “कुछ लोग भ्रम में जीते हैं कि अच्छा वस्त्रा पहन लेने से ही उन्हें सम्मान मिलने लगेगा। सच तो यह है कि व्यक्ति को सम्मान उसके बाह्य आवरण के कारण नहीं, अपितु आन्तरिक गुणों के कारण मिलता है।”
बोलनेवाले सभासद के होंठों पर ऐसा कहते समय व्यंग्य-भरी मुस्कान तैर गई और उसने वक्र--ष्टि से सभा में बैठे उस सभासद की ओर देखा जो निर्लिप्त भाव में सभा में बैठा था और अब तक कुछ बोला नहीं था।
तभी एक दूसरे सभासद ने पूर्ववक्ता की हाँ में हाँ मिलाई और कहने लगा, “ठीक कहते हो भाई! इन दिनों यह प्रवृत्ति देखने में आ रही है कि कुछ लोग ललाट पर चन्दन लगाकर पंडित या ज्ञानी होने का स्वाँग करते हैं। उनका स्वाँग भले ही कुछ लोगों को भ्रमित कर दे लेकिन ज्ञान की परख रखनेवालों की -ष्टि से उनकी वास्तविकता छुपी नहीं रह सकती। ज्ञानी जानते हैं कि तिलक लगा लेने मात्रा से कोई पंडित नहीं हो जाता। पांडित्य के लिए तिलक की आवश्यकता ही क्या है? पांडित्य तो अध्ययन और मनन की स्वाभाविक