तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदेर में महाराज के आमंत्रित अतिथियों का आगमन होने लगा। एक से बढ़कर एक परिधान में सजे-धजे लोगों के आने का क्रम थोड़ी देर तक जारी रहा फिर थम सा गया। राजभवन के भोजन-कक्ष मंे लोगों की सज-धज देखकर ऐसा लगता था मानो कुबेर के कक्ष में देवताओं की जमघट लगी हो! महाराज स्वयं अतिथियों को आसन ग्रहण करने के लिए उनके लिए निर्धारित आसनों की ओर इंगित कर रहे थे। सभी आसन भर चुके थे, मात्रा तेनाली राम का आसन रिक्त था। महाराज बार-बार उस रिक्त आसन की ओर देखते और फिर प्रवेश द्वार की ओर उनकी -ष्टि जाती। मन-ही-मन महाराज को तेनाली राम की अनुपस्थिति उत्तेजित कर रही थी। वे सोच रहे थे-कितना ढीठ है यह तेनाली राम! उसे यह ज्ञान है कि भोजन किसके सान्निध्य में करना है फिर भी वह निर्धारित समय पर नहीं आया। लेकिन मन में उठते आक्रोश को पी जाने के अलावा महाराज कर भी क्या सकते थे। वहाँ उपस्थित सभासदों को तेनाली राम की अनुपस्थिति से उसके विरुद्ध आग उगलने का अवसर मिल गया। वे आपस में तेनाली राम की अनुपस्थिति का मजाक उड़ाने लगे। कोई कहता-तेनाली राम अपनी पगड़ी की तहें सजाने में लगा होगा, तो कोई कहता-अरे भाई, तेनाली राम अपनी रेशमी धोती का फेंटा कसने में लगा होगा। फेंटा कस ले, तो आएगा...और इस तरह की बातें खत्म भी नहीं हो पातीं कि सभी ही-ही, ही-ही करने लग जाते। अन्ततः तेनाली राम ने भोजन-कक्ष में प्रवेश किया। सचमुच, बहुत आकर्षक परिधान में सजा-धजा था तेनाली राम। महाराज ने उसकी ओर आग्नेय -ष्टि से देखा मगर कुछ कहा नहीं। -ष्टिमात्रा से ही उन्होंने तेनाली राम के प्रति अपना आक्रोश अभिव्यक्त कर दिया। बड़े और सामर्थ्यवान लोग परिस्थिति विशेष में अपनी आंगिक भंगिमाओं से ही अपने मनोभावांे को व्यक्त करते हैं। महाराज के मनोभावों को समझते हुए तेनाली राम ने महाराज के सामने हाथ जोड़ लिये और कहा, “महाराज! क्षमा करें। यहाँ समय पर उपस्थित नहीं हो पाया।” महाराज आक्रोश में तो थे ही, तेनाली राम का अनुनय सुनकर उनकी उत्तेजना शान्त न रह सकी और व्यंग्योक्ति में प्रकट हुई, “हाँ, देख रहा हूँू, आपका कुर्ता बहुत चमक रहा है।” महाराज की व्यंग्योक्ति सुनकर सारे अतिथि-सभासद ठठाकर हँस पड़े। तेनाली राम ने इसी ठहाके के बीच अपना आसन ग्रहण किया। तेनाली राम की ओर महाराज ने देखा तो उसे अतिशय गम्भीर पाया। महाराज सोचने लगे कि तेनाली राम के प्रति उन्हें व्यंग्योक्तियों का व्यवहार नहीं करना चाहिए था। क्या पता, किस परिस्थिति में था वह! बिना जाने-समझे इस तरह का व्यवहार किसी राजा के लिए कदापि शोभनीय नहीं है। यह तो उच्छृंखलता है। हो सकता है कि तेनाली राम किसी संकट में पड़ गया हो जिसके कारण वह समय पर नहीं पहँुच पाया।