तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज के कान खड़े हो गए इस सभासद की बात सुनकर। महाराज भी सोचने लगे कि जरूर तेनाली राम ने महामंत्री को खुश करने के लिए यह बात कही है...तो क्या तेनाली राम महामंत्री के साथ साँठ-गाँठ कर किसी कारनामे को अंजाम देने के चक्कर में है? क्या तेनाली राम कुछ ऐसा कर सकता है जिससे विजयनगर की सत्ता पर आँच आए...? महाराज के मन में तरह-तरह की आशंकाएँ पैदा होने लगीं। जरा सी बात पर महाराज के मन में उत्पन्न हुई इस आशंका ने महाराज को बेचैन कर दिया। ठीक ही कहा गया है कि सत्ता का स्वभाव सन्देह करना भी है। महाराज ने मन-ही-मन तय कर लिया कि जब तक वे तेनाली राम की आन्तरिक भावनाओं को समझ नहीं लेते तब तक चैन से नहीं बैठेंगे और न ही तेनाली राम पर विश्वास ही करेंगे। प्रकट रूप से महाराज ने अपना व्यवहार पूर्ववत् रखा। इस घटना के कुछ दिन व्यतीत हो जाने के बाद एक सन्ध्या महाराज कृष्णदेव राय अपनी फुलवारी में तेनाली राम के साथ टहल रहे थे। टहलते-टहलते महाराज ने अचानक तेनाली राम से पूछा, “तेनाली राम! उस दिन तुमने किस आधार पर महामंत्री से कहा कि उनका पौत्रा बहुत तेजस्वी होगा?” तेनाली राम ने हँसकर कहा, “अरे वो बात!...बस, ऐसे ही महाराज! मेरी -ष्टि बालक के गतिशील पैरों पर पड़ी। उसके पैरों की सशक्त लययुक्त गतिशीलता से मुझे लड़के की सुगढ़ मानसिक संरचना का अनुमान हुआ और बरबस ही वह बात मेरे मँुह से निकल गई।“ महाराज मौन हो गए लेकिन उनका हृदय अभी भी आशंकित था। थोड़ी देर के बाद उन्होंने तेनाली राम को विदा किया और स्वयं महल में चले गए। इस घटना के भी कई दिन गुजर गए। तेनाली राम के मन में कोई बात थी ही नहीं। वह अपनी सहज, स्वाभाविक शैली में सभा में आता। सभा की कार्रवाई में भाग लेता और लौट जाता। एक दिन महाराज कृष्णदेव राय की सभा में एक व्यक्ति आया और महाराज के सामने एक बक्सा रखकर बोला, “महाराज! मैं चन्द्रावती नगर का एक व्यापारी हूँ। मेरा नाम सोमदत्त है। मुझे व्यापार में घाटा लगा है। मेरा सारा धन समाप्त हो चुका है। बस, मेरे पास स्वर्ण-निर्मित दो गोले शेष हैं।” इतना कहकर उस व्यापारी ने वह बक्सा खोल दिया। सभासदों की आँखें यह देखकर विस्मय से फैल गईं कि बक्से में गेंद की आकृति के दो स्वर्ण-पिंड रखे हुए हैं। उस व्यापारी ने अपनी बात जारी रखी, “महाराज! इन दो स्वर्ण-पिंडों में से एक स्वर्ण- पिंड ठोस है और दूसरा खोखला है। आपके दरबार में मैं इन स्वर्णपिंडों को एक स्थान पर लटका दूँगा, जहाँ इसे आपके सभी सभासद देख सकें। यदि आपके दरबार का कोई