तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतेनाली राम से पूछने लगे, “बताओ तेनाली राम! क्या ये दोनों मेरे मित्र नहीं हैं? क्या तुम्हें इनकी मित्रता पर सन्देह है? क्या बात है, बिना डर के बोलो। तुम्हारे मन में इनके प्रति क्या धारणा है?” महाराज के स्वर में जिज्ञासा थी। महाराज के बदले स्वर को सुनकर तेनाली राम के मन में विचार उत्पन्न हुआ कि सत्ता कितने आडम्बर से अपना दर्पपूर्ण चेहरा बनाए रखती है किन्तु सच का एक झोंका उसे जड़ से हिला देता है। यही महाराज कृष्णदेव राय अभी दो क्षण पहले अपनी मित्रता की बखान करते हुए अपने मित्रों के प्रति अपने कर्तव्य का उल्लेख कर रहे थे और अब वही महाराज कृष्णदेव राय संशययुक्त मन से पूछ रहे हैं, ‘क्या वे मित्रा नहीं हैं?’ तेनाली राम ने स्थिति अनुकूल पाते हुए उसका लाभ उठाया और बोला, “महाराज! मित्र-अमित्र की पहचान मैंने नहीं की है किन्तु यदि आप चाहें तो वह भी कर सकता हूँ।” “हाँ, तेनाली राम! मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे बताओ कि इन दोनों में से मेरा सच्चा मित्र कौन है?” महाराज ने कहा। “तो ठीक है महाराज!” तेनाली राम ने विश्वास-भरी दृष्टि से महाराज की आँखों में झाँकते हुए कहा, “आज रात्रि विश्राम मैं राजभवन में कर सकूँ, ऐसी व्यवस्था करा दें। मेरे ठहरने का प्रबन्ध अपने इन दोनों मित्रों के कक्ष के आसपास करा दें।” महाराज मान गए। शाम को तेनाली राम आया तो उसे महाराज के मित्र प्रसेनजित और वज्रबाहु के कक्षों के सामने के एक कक्ष में ठहरा दिया गया। तेनाली राम के राजभवन में ठहरने की सूचना गोपनीय रखी गई। महाराज कृष्णदेव राय स्वयं एक बार तेनाली राम के कक्ष में आए। उन्होंने तेनाली राम से कहा, “कुछ चाहिए तो बताओ।” “नहीं महाराज, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस, आप इतना करें कि अपने मित्रों के कक्ष में ही रात्रि का भोजन भेजें। भोजन में ऐसे पकवान हों जिनमें अच्छी सुगन्ध हो। सुस्वादु पकवानों से भरे थाल जब आप अपने मित्रों के कक्ष में भिजवा दें तब तुरन्त यह समाचार फैला दें कि आपका स्वास्थ्य अचानक बहुत खराब हो गया है। बाकी बातें हम लोग बाद में करेंगे।” तेनाली राम ने कहा। “लेकिन इससे होगा क्या?” महाराज ने पूछा। “यही तो देखना है महाराज!” तेनाली राम ने कहा।