तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 118 में से
संदर्भ में पढ़ेंफलियों की शिक्षा एक बार विजयनगर के सम्राट महाराज कृष्णदेव राय की इच्छा हुई कि वे अपने राज्य का भ्रमण करें और अपनी प्रजा के दुख-सुख को स्वयं अपनी आँखों से देखें ताकि उन्हें अपने राज्य के विकास की योजना बनाते समय उन जरूरी बातों का ध्यान रह सके जिनका अभाव अभी उनकी प्रजा अनुभव कर रही है। उन्होंने अपनी इच्छा तेनाली राम को बताई। तेनाली राम ने महाराज की बातें ध्यानपूर्वक सुनीं। उसे महाराज की बातें अच्छी लगीं। उसने महाराज से कहा, “महाराज! बहुत उत्तम विचार है। जितनी जल्दी हो सके, राज्य- भ्रमण का कार्यक्रम बना लें।” “ठीक है। कार्यक्रम बन जाएगा। मगर मेरी इच्छा है कि राज्य-भ्रमण के दौरान तुम मेरे साथ रहो।” महाराज ने कहा। तेनाली राम ने तत्काल उत्तर दिया, “आपकी इच्छा मेरे लिए सर्वोपरि है महाराज! आप आदेश करें-मैं आपको हर क्षण उपलब्ध मिलूँगा।” जल्दी ही महाराज के राज्य-भ्रमण का कार्यक्रम बन गया। महाराज ने अपने साथ कुछ चुनिन्दे एवं विशेष रूप से प्रशिक्षित सिपाहियों का दस्ता रखा और तेनाली राम के साथ घोड़े पर सवार होकर राज्य-भ्रमण के लिए निकल पड़े। पहले दिन ही संयोग ऐसा रहा कि राह में कोई बाजार नहीं मिला। घोड़े थक कर चूर थे। महाराज भी थकान का अनुभव कर रहे थे। उन्होंने तेनाली राम से कहा, “मुझे लगता है कि अब शाम ढलने को है। हमें यहीं कहीं अच्छी जगह देखकर पड़ाव डालना होगा। भूख और प्यास से सभी बेहाल हैं। भोजन की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी।” तेनाली राम ने महाराज से कहा, “महाराज! मुझे लग रहा है कि दाईं तरफ नजदीक में ही कोई नदी हमें मिल सकती है...आप भी अनुभव कर सकते हैं कि दाईं तरफ से जो हवा आ रही है, उसमें शीतलता है। यह शीतलता नमी के कारण ही हो सकती है।” महाराज ने तेनाली राम की बातें सुनकर दाईं तरफ अपने घोड़े को घुमाया और थोड़ी दूर तक मन्थर गति से उसे दौड़ाया। इसके बाद उन्हें भी लगा कि तेनाली राम के अनुमान में सत्यता है और उन्होंने साथ चल रहे दस्ते को उसी दिशा में चलने का संकेत कर दिया। थोड़ी देर में ही वे लोग नदी के किनारे पहुँच गए।