त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एतल्लक्षणमीशस्यानुग्रहे ज्ञेयमादितः ॥ २४ ॥ भोगवैरस्यमपरं विचारप्रवणं मनः । हन्त ते सम्प्रवक्ष्यामि वृत्तिं प्रोक्तां सदात्मनः ॥ २५ ॥ परा चितिर्मे जननी सखी बुद्धिर्मता मम । अविद्या त्वसती सोक्ता यया बुद्धिः सुसङ्गता ॥ २६ ॥ अविद्यायास्तु सामर्थ्यं लोके स्पष्टं विचित्रितम् । यद्रज्जौ सर्पमाभास्य महाभीतिं प्रयच्छति ॥ २७ ॥ महामोहस्तु तत्पुत्रो मनस्तस्य सुतोऽभवत् । तस्य पत्नी कल्पना स्यात्तत्सुताः पञ्च येऽभवन् ॥ २८ ॥ ज्ञानेन्द्रियाणि ते पञ्च तत्स्थानं गोलकं भवेत् । विषयाणां प्रमोषस्तु संस्कारो मनसो भवेत् ॥ २९ ॥ तद्भोगः स्वप्नभोगः स्यात् कल्पनायाः स्वसा तु या । महाशना भवेदाशा तस्या यौ तनुजावुभौ ॥ ३० ॥ भगवान्की कृपा होनेमें यह सबसे पहला लक्षण समझना चाहिये ॥२४॥ दूसरा लक्षण है भोगोंमें विरसता भासना और मनका विचारो- न्मुख हो जाना। अब मैंने आपसे जो सत्य आत्माकी स्थितिका वर्णन किया था उसका स्पष्टीकरण करती हूँ ॥ २५ ॥ परा चिति मेरी माता है; बुद्धि सखी मानी गयी है; अविद्या ही असली स्त्री है, जिसके साथ बुद्धिका मेल हो जाता है ॥ २६ ॥ अविद्याका अद्भुत सामर्थ्य तो लोकमें स्पष्ट ही है कि वह रस्सीमें सर्पकी प्रतीति कराकर अत्यन्त भय उत्पन्न कर देती है ॥ २७ ॥ उसका पुत्र है महामोह और उसके मन नामका पुत्र हुआ। उसकी पत्नी है कल्पना और उससे जो पाँच पुत्र हुए वे हैं पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। उनके स्थान हैं पाँच इन्द्रियगोलक। उन इन्द्रियोंके विषयोंका सेवन ही मनका संस्कार बन जाता है ॥ २८-२९ ॥ उन संस्कारोंका भोग ही स्वप्नका भोग है। कल्पनाकी जो महाशना (बहुत खाने वाली) बहिन है वह आशा है, उसके जो