त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः । ११५ के वा वयं स्वरूपं किमस्माकं तद् ब्रवीहि मे । इति पृष्टा हेमलेखा रामोवाच प्रियं प्रति ॥ ५ ॥ नाथ शृणु प्रवक्ष्यामि गूढार्थमिदमादरात् । विचारयात्मनो रूपं बुद्ध्याऽत्यन्तविशुद्धया ॥ ६ ॥ न दृश्यं नापि तद्द्वाच्यमतो वक्ष्यामि तत् कथम् । ज्ञातस्वात्मस्वरूपो वै ततो ज्ञास्यसि मातरम् ॥ ७ ॥ न ह्यादेशस्वरूपेऽस्ति तत आदेष्टृवर्जितम् । स्वं रूपं स्वात्मना पश्य शुद्धबुद्धिसमाश्रयम् ॥ ८ ॥ देवादितिर्यगन्तानां भान्तं भानैरभासितम् । भान्तं सर्वत्र सर्वस्य सर्वदा भानवर्जितम् ॥ ९ ॥ हम कौन हैं और हमारा स्वरूप क्या है—यह भी मुझसे कहो ।” परशुराम ! इस प्रकार पूछे जानेपर हेमलेखानें अपने प्रियतमसे कहा ॥ ५ ॥ “नाथ ! सुनिये, मैं यह गूढ रहस्य सुनाती हूं। आप आदर- पूर्वक विशुद्ध बुद्धिसे अपने स्वरूपका विचार करें ॥ ६ ॥ वह आत्मतत्त्व न तो देखनेमें आता है और न कहा ही जा सकता है। अतः मैं किस प्रकार उसका वर्णन करूँ। आपको जब उस आत्माके स्वरूपका ज्ञान हो जायगा तभी आप अपनी माताको भी जान सकेंगे ॥ ७ ॥ आत्माके स्वरूपके विषयमें कोई उपदेश भी नहीं हो सकता, इसलिये उसका कोई उपदेश करनेवाला भी नहीं है। आप शुद्ध बुद्धिके आश्रयभूत उस आत्मस्वरूपको आत्मभावसे ही देख सकते हैं* ॥ ८ ॥ वह देवताओंसे लेकर कीट-पतंगादि पर्यन्त सभीके आत्मस्वरूपसे भासमान है, किन्तु किसी भी अन्य प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला नहीं है। वही सबको सर्वत्र ज्ञानरूपसे भास रहा है, किन्तु किसी भी प्रमाण का विषय नहीं है ॥ ९ ॥
- 'शुद्धबुद्धि' अर्थात् विषयविमुक्त बुद्धिके 'आश्रय'-अधिष्ठान भूत उस आत्म- तत्त्वको निखिल दृश्यरूप अनात्माका निषेध कर देनेपर 'आत्मभाव'से अर्थात दृश्य और दृश्याभावके साक्षीरूपसे ही अनुभव कर सकते हैं।