त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः । ११७ ममार्थमखिलं त्यक्त्वा यत्त्यक्तुं नैव शक्यते । तथाऽऽत्मानं समालक्ष्य परं श्रेयः समाप्नुहि ॥ १६ ॥ इत्युक्तः प्रियया हेमचूड उत्थाय वै द्रुतम् । ययावश्वं समारुह्य तत्क्षणे नगराद्बहिः ॥ १७ ॥ उद्यानं नन्दनसमं प्रविश्य क्षणमात्रतः । वनान्तसौधमुन्नम्रं स्फाटिकं प्रविवेश ह ॥ १८ ॥ विसृज्यानुचरान् सर्वान् द्वारपालानशासयत् । न कोऽप्यत्र प्रविशतु मय्येकान्तविचारणे ॥ १९ ॥ राजामात्याश्च गुरवो राजा वाऽप्यत्र सङ्गतः । अप्रवेश्या एव यावदहमाज्ञां दिशामि वः ॥ २० ॥ इत्युक्त्वाऽऽरुह्य सौधाग्र्यं नवमीं भूमिमाविशत् । तत्र वातायने चित्रे सर्वलोकावलोकने ॥ २१ ॥ इसी प्रकार 'अपने' कहे जानेवाले सभी पदार्थोंको त्यागने पर फिर जिसका त्याग न किया जा सके उसीको आत्मा जानकर आप परम कल्याणको प्राप्त करें" ॥ १६ ॥ प्रियाके इस प्रकार कहनेपर हेमचूड तत्काल उठा और घोड़ेपर चढ़कर उसी समय नगरसे बाहर चला गया ॥ १७ ॥ एक क्षणमें ही वह नन्दनवनके समान अपने उद्यानमें पहुँचा और उसके भीतर स्फटिकके बने हुए एक ऊँचे मन्दिरमें प्रविष्ट हो गया ॥ १८ ॥ अपने सभी सेवकोंको उसने बाहर छोड़ दिया और द्वारपालोंको आज्ञा दी की यहाँ एकान्त में विचार करते समय कोई भी भीतर न आये ॥ १६ ॥ चाहे राजमन्त्री, गुरुजन अथवा स्वयं महाराज भी यहाँ आवें तो भी जबतक मैं तुम्हें आज्ञा न दूँ तबतक उन्हें भी प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ २० ॥ ऐसा कह वह महलके ऊपर चढ़कर नवीं मंजिलपर पहुँच गया । वहाँके झरोखे में जहाँसे सब ओरका दृश्य दिखायी देता था,