भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 158

एकादशोऽध्यायः श्रुत्वैवं हेमचूडस्य कथामत्यद्भुतां तदा । भार्गवः सन्दिग्धमनाः प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ १ ॥ भगवन् श्रीगुरो यत्ते प्रोक्तं ज्ञानं महाद्भुतम् । भाति मे विषमं ह्येतदसाध्यं चापि सर्वतः ॥ २ ॥ कथमेतज्जगद् दृश्यं चितिमात्रस्वरूपकम् । अदृष्टं केवलं ह्येतच्छ्रद्धोपेयं न चान्यथा ॥ ३ ॥ चितिश्चेत्यविनिर्मुक्ता नानुभाव्या कथंचन । नोपपन्नं सर्वथैतत्कथं चित्तं समारुहेत् ॥ ४ ॥ कृपया बोधनीयोऽहमत्र सर्वात्मना खलु । इत्यापृष्टो दत्तगुरुरवदद्भार्गवं प्रति ॥ ५ ॥ एकादश अध्याय ॥ ११ ॥ जगत्‌के स्वरूपका विवेचन इसप्रकार हेमचूडकी यह अद्भुत कथा सुनकर परशुरामजीके मनमें कुछ सन्देह हुआ और वे पूछने लगे— ॥ १ ॥ “भगवन् ! गुरुदेव ! आपने जो बड़ा ही विचित्र तत्त्वज्ञान कहा है, वह मुझे तो सब प्रकार बड़ा कठिन और असाध्य जान पड़ता है ॥ २ ॥ यह दृश्य जगत् केवल चिन्मात्रस्वरूप कैसे हो सकता है ? यह बात प्रत्यक्ष देखनेमें तो नहीं आती; हाँ, श्रद्धासे मानी जा सकती है, और किसी प्रकार नहीं ॥ ३ ॥ चेत्यसे भिन्न चिति तो किसी प्रकार अनुभवमें भी नहीं आ सकती । यह बात किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है, फिर यह चित्तमें कैसे बैठे ? ॥ ४ ॥ यह विषय कृपा करके मुझे सब प्रकार समझा दीजिये।” इस प्रकार पूछे जानेपर गुरु दत्तात्रेयजी परशुरामसे बोले— ॥ ५ ॥

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक) · पृष्ठ 158, कुल 404 में से · BharatKosha