त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे आसाद्य यज्ञसदनं नृपं संयोज्य चाशिषा ॥ ३३ ॥ आक्षिपत्तत्र सभ्यांस्तु शृण्वताञ्च सभासदाम् । राजंस्ते यज्ञसदनमत्यन्तं नैव शोभते ॥ ३४ ॥ कमलाकरवत्काककङ्कवृन्दस्य सञ्चयात् । सभा विद्वत्समुदयैः क्षोमिनी शोभतेतराम् ॥ ३५ ॥ शारदं हंससंघातैः सपद्मं तु सरो यथा । तदत्र विद्याविशदं न पश्याम्येकमप्यलम् ॥ ३६ ॥ स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि नात्र मे संस्थितिर्भवेत् । कथं सभामिमां मूर्खप्रचुरां संविशाम्यहम् ॥ ३७ ॥ एवं वारुणिना प्रोक्ताः सभ्याश्चक्रुधुरञ्जसा । किमरे द्विजबन्धो ! त्वमधिक्षिपसि सर्वतः ॥ ३८ ॥ केयं तवेदृशी विद्या यया सर्वे वयं जिताः । वृथा कत्थसि दुर्बुद्धे जित्वास्मांस्त्वं गमिष्यसि ॥ ३९ ॥ के लिये ब्राह्मणका वेष धारण कर जनकके यज्ञमें आया ॥३२ उ०-३३पू०॥ उसने यज्ञशालामें आकर राजाको आशीर्वाद दे सब सभासदोंको सुनाते हुए उनपर आक्षेप किया, "राजन् ! यज्ञमण्डप तो विशेष शोभित नहीं है, जिस प्रकार कौए और कंकसमुदायके इकट्ठे हो जानेसे सरोवरकी शोभा नहीं होती ॥ ३३ उ०-३५ पू० ॥ सुन्दर सभाकी शोभा तो विद्वत्समुदायसे ही होती है, जैसे कमलोंसे युक्त शरत्कालीन सरोवर हंससमूहसे ही सुशोभित होता है ॥ ३५ उ०-३६ पू० ॥ सो, मुझे तो यहाँ एक भी विद्याविभूषित सदस्य दिखायी नहीं देता । तुम्हारा कल्याण हो, मैं तो जाता हूँ । यहाँ मेरा निर्वाह नहीं हो सकता । इस मूर्खबहुल सभामें मैं कैसे बैठ सकता हूँ ?” ॥. ३६ उ०-३७ ॥ वरुणपुत्रके इस प्रकार कहनेपर सभी सभासद स्वभावसे ही क्रोधमें भर गये [ और बोले-] "अरे ब्राह्मणाधम ! तू सभीका अपमान कैसे कर रहा है ? ॥ ३८ ॥ तुझमें ऐसी क्या विद्या है जिससे तू हम सभीको जीत सकता है। मूर्ख ! तू व्यर्थ क्यों बकवाद करता है ? अब हमें जीतकर ही जाना ॥ ३६ ॥