त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः। २१६ विना सद्गुरुसेवायां देवतानुग्रहादिना ॥ ७८ ॥ मुनिपुत्राभिधास्यामि शृण्वेतत्सूक्ष्मया धिया । नेदं श्रुत्वापि विज्ञेयं ताटस्थ्यप्राणया धिया ॥ ७९ ॥ यावदेतद्धि विज्ञानमनुदाहृतमात्मनि । तावत्सहस्रशः प्रोक्तं श्रुतं चापि निरर्थकम् ॥ ८० ॥ यथा कश्चित्स्वकण्ठस्थं मुक्ताहारं प्रमादतः । अविज्ञाय हृतं चौरैर्मन्यते मूढभावतः ॥ ८१ ॥ प्रबोधितोपि स पुनः कण्ठेऽस्तीति हि केनचित् । स्वात्मानमनुदाहृत्य यावत्कण्ठं न पश्यति ॥ ८२ ॥ तावन्नाप्नोति कण्ठस्थं हारं सूक्ष्मविमर्श्यपि । एवं मुनिसुतात्मानं स्वस्वभावं निशम्य च ॥ ८३ ॥ भूयोऽतिनिपुणोऽप्यन्तरात्मानमनुदाहरेत् । यावत्तावद्बहिः कुत्र कथं तद्विदितं भवेत् ॥ ८४ ॥ तर्कद्वारा सूक्ष्म बुद्धिसे इसे कभी कोई नहीं जान सकता ॥ ७८ ॥ मुनिपुत्र ! मैं तुम्हें समझाती हूं, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो । तटस्थ प्राण (असमाहित चित्त) रहनेपर तो इसे सुनकर भी कोई जान नहीं सकता ॥ ७९ ॥ जबतक यह विज्ञान अपने अन्तःकरणमें अनुभूत नहीं होता तब- तक हजारों वार सुनाना या सुनना भी व्यर्थ ही होता है ॥ ८० ॥ जिस प्रकार कोई पुरुष अपने गलेमें पड़े मोतियोंके हारको भ्रमवश न जानकर अज्ञानवश समझता है कि उसे चोरों ने चुरा लिया ॥ ८१ ॥ उसे कोई ऐसा समझाते भी कि वह तेरे गले में है तो भी जबतक अपने शरीरके अभिमुख होकर वह अपने कण्ठको नहीं देखता तबतक, बड़ा सूक्ष्म विचार करनेवाला होनेपर भी, उसे वह कण्ठस्थ हार नहीं मिलता, इसी प्रकार हे मुनिपुत्र ! अपने आत्मा और आत्माके स्वभावके विषयमें बार-बार सुनकर भी जबतक समाहितचित्त होकर आत्माके अभिमुख नहीं होता तबतक अत्यन्त निपुण पुरुष भी उसे बाहर कहाँ और कैसे जान सकता है ? ॥ ८२-८४ ॥ १. अर्थात् 'मैं ऐसा हूँ या नहीं' ऐसा निर्णय करनेके लिये अन्तःकरण समाहित होकर अपने स्वरूपके अभिमुख नहीं होता ।