भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

षोडशोऽध्यायः । २२६ तस्मात्तदेकपरता प्रत्यावृत्तिश्च चक्षुषः । प्रत्यावृत्तं मनः शुद्धं निजरूपावभासकम् ॥ ३३ ॥ अत्र ते सम्प्रवक्ष्यामि शृणु तन्नियताऽन्तरः । अगोचरश्चेदात्माऽसौ मनसा गोचरोऽपि च ॥ ३४ ॥ अत्र मुह्यन्ति बहवः श्रुत्यागमविवेचकाः । मनोगोचरता बाह्ये द्विप्रकारेण संस्थिता ॥ ३५ ॥ आद्याऽन्येभ्यः परावृत्तिः परा तत्परता भवेत् । अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेऽपि मनसः सति ॥ ३६ ॥ न किञ्चिद्भासयेद्वस्तु तटस्थाऽवसरेषु तत् । तस्मात्तत्परताऽप्यत्र व्यापारो मानसः परः ॥ ३७ ॥ एवं व्यावृत्तभावानां व्यापारद्वयभासनम् । अन्यावृत्ता चितिर्यस्मात्तस्मान्मात्रं तथा भवेत् ॥ ३८ ॥ अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेणैवाऽवभासयेत् । यथा पुरःस्थितादर्शे किञ्चिद्दर्शनहेतवे ॥ ३९ ॥ अतः एकमात्र अपने लक्ष्यपर दृष्टि रखना ही नेत्रकी अन्तर्मुखता है। अन्तर्मुख शुद्ध चित्त ही अपने वास्तविक स्वरूपका साक्षात्कार करानेवाला है ॥ ३३ ॥ अब मैं तुमसे जो बात कहता हूँ वह संयतचित्त होकर सुनो। यह आत्मा मनका अविषय भी है और उसका विषय भी ॥ ३४ ॥ अनेकों वेद-शास्त्रोंकी आलोचना करनेवाले भी इस विषयमें मोह- ग्रस्त ही रहते हैं। बाह्य पदार्थोंमें मनकी विषयता दो प्रकारसे है ॥ ३५॥ प्रथम तो अन्य विषयोंसे मनको मोड़ना और दूसरे उसे अपने लक्ष्यमें जोड़ देना। मनके अन्य पदार्थोंसे केवल हट जानेपर भी तटस्थ अवस्थाओंमें कोई वस्तु नहीं भासती। अतः इसके लिये मनका अपने विषयमें जुड़ना-यह दूसरा व्यापार भी आवश्यक है ॥ ३६-३७ ॥ इस प्रकार जो परिच्छिन्न पदार्थ हैं उनका भान तो उक्त दोनों व्यापारोंसे होता है। किन्तु चिति तो अपरिच्छिन्ना है, इसलिये इसके अनुभवके लिये ऐसा नियम नहीं है ॥ ३८ ॥ यह तो अन्य पदार्थोंसे चित्तके हट जानेपर ही भासित हो जाती है। जिस प्रकार सामने रखे दर्पणमें यदि कोई पदार्थ देखना हो तो