त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे महाकाशात् सुवितते कुतो मयि निरोधनम् ॥ ९९ ॥ एवं पूर्णानन्दरूपे समाधिः स्यात् कथं मयि । चिदानन्दप्रपूर्णस्य पूर्णस्य गगनादपि ॥ १०० ॥ मम क्रिया कथं का स्यादद्वयाऽपि शुभाशुभा । अनन्तेषु शरीरात्माभासेषु मन्महित्वतः ॥ १०१ ॥ क्रियाभासावभासेन तदभावेन वाऽपि किम् । कर्त्तव्यं वाप्यकर्त्तव्यं मम नास्त्यपि लेशतः ॥ १०२ ॥ तस्मान्निरोधने किं स्यादहमानन्दनिर्भरः । समाधावसमाधौ वा सत्यपूर्णस्वभावकः ॥ १०३ ॥ यस्यां क्रियायां देहोऽयं स्थितस्तत्रैव तिष्ठतु । इत्यहं सर्वथा स्वस्थः सुमहामन्दमन्दिरः ॥ १०४ ॥ अनस्तमितभारूपोऽहं सुपूर्णो निरञ्जनः । उत्तमाधिकृतस्यैवं स्थितिर्मे सम्प्रकीर्तिता ॥ १०५ ॥ होगा नहीं। मैं तो व्यापक महाकाश हूँ, मेरा निरोध कैसे होगा ? ॥९६॥ इस प्रकार पूर्णानन्दस्वरूप मेरी समाधि होगी ही कैसे ? तथा मैं तो चिदानन्दसे परिपूर्ण और आकाशसे भी अधिक व्यापक हूँ! फिर मेरे द्वारा कोई शुभ या अशुभ अद्वितीय क्रिया भी कैसे हो सकेगी ? ॥ १००--१०१ पू० ॥ अनन्त शरीर और आत्माभास मेरी महिमासे भास रहे हैं। फिर किसी क्रियाभासके भासने अथवा न भासनेसे मुझे क्या प्रयोजन है ? इसलिये मेरा लेशमात्र भी न कोई कर्त्तव्य है न अकर्त्तव्य ॥ १०१ उ०-१०२ ॥ मैं तो आनन्दसे परिपूर्ण हूँ, अतः निरोध करनेसे ही मुझे क्या मिलेगा ? मेरी समाधि हो अथवा न हो मैं तो सत्य और पूर्णस्वरूप ही हूँ ॥ १०३ ॥ मेरा यह शरीर जिस क्रियामें स्थित हो उसीमें स्थित रहे। ऐसा विचारकर मैं तो सर्वदा अपने स्वरूपमें ही स्थित और परमानन्दसे परिपूर्ण रहता हूँ। मैं अलुप्तप्रकाशस्वरूप, परिपूर्ण और निर्मल हूँ ॥ १०४-१०५ पू० ॥ इस प्रकार मैंने उत्तमाधिकारी अपनी ही स्थितिका वर्णन किया।