भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 284

२७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यथाऽऽदर्शं विना किञ्चित् प्रतिबिम्बं न भाति वै । आदर्शान्नातिरिक्तोऽतः प्रतिबिम्बो भवेद्यथा ॥ ६४ ॥ एवं चितिमृते किञ्चिदतिरिक्तं न विद्यते । अतएव मनोऽप्यन्यत् सर्वथा नास्ति वै चितेः ॥ ६५ ॥ यथा स्वप्ने मनस्तद्वज्जाग्रत्यपि मनो न हि । कल्पितं कार्यसंसिद्ध्यै करणं केवलं मनः ॥ ६६ ॥ यथा स्वाप्नः कुठारः स्यात् करणं तरुछेदने । राम क्रियाऽसत्यरूपा सत्यं तत् करणं कथम् ॥ ६७ ॥ असता नरशृङ्गेण कः कदा सुविदारितः । तस्मान्नास्ति मनो राम चासत्कार्यस्य कारणम् ॥ ६८ ॥ स्वप्ने दृशिः क्रिया कार्यं कारणं मन उच्यते । यथा तथा सर्वदापि मनो नास्ति क्रियाकरम् ॥ ६९ ॥ जिस प्रकार दर्पणके बिना कोई भी प्रतिबिम्ब नहीं भासता और इसीसे जैसे दर्पणसे भिन्न प्रतिबिम्ब है ही नहीं, इसी प्रकार चेतनके बिना और चेतनसे भिन्न कुछ भी नहीं है। अतः मन भी चेतनसे भिन्न बिलकुल नहीं है ॥ ६४-६५ ॥ जैसे स्वप्नमें [स्वाप्न पदार्थों से भिन्न] मन नहीं है उसी प्रकार जाग्रत्में भी मनकी पृथक् सत्ता नहीं है। स्वप्नके समान जाग्रत्में भी कार्यनिर्वाहके लिये करणरूपसे मन की कल्पना हो जाती है ॥ ६६॥ जिस प्रकार स्वप्नमें पेड़ काटनेके लिये स्वप्नकी ही कुल्हाड़ी होती है [वैसे ही मन भी कल्पित ही होता है]। परशुराम! यदि स्वप्नकी क्रिया असत्य है तो उसका साधन ही कैसे सत्य हो सकता है ॥ ६७ ॥ मनुष्यके सींग होता ही नहीं। फिर उस अलीक नरशृंगसे कोई कब विदीर्ण हो सकता है। अतः परशुराम! स्वप्नमें असत्य कार्यका कारण मन है ही नहीं ॥ ६८ ॥ स्वप्नमें जैसे दृकशक्ति ही क्रियारूप कार्य और उसका कारण मन कही जाती है उसी प्रकार सर्वदा ही जाग्रत् कालमें भी क्रिया करनेवाला मन वास्तवमें नहीं है ॥ ६९ ॥