त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे वृक्षान् केचिच्छिलाः केचिद् गुहाः केचिदुपासदुः । अश्वारूढौ राजपुत्रावपि दूरं पलायितौ ॥ १९ ॥ हेमचूडः क्वचित्तत्र प्रपेदे तापसाश्रमम् । कदलीखर्जूरवनैराक्रान्तमतिसुन्दरम् ॥ २० ॥ तत्रापश्यच्छुभां काञ्चित् कन्यामग्निशिखामिव । प्रद्योतमानां वपुषा तप्तहेमसुवर्चसाम् ॥ २१ ॥ तां दृष्ट्वा राजपुत्रोऽपि पद्मामिव सुरूपिणीम् । स्मयमान इवाऽपृच्छत् का त्वं पद्मानने वने ॥ २२ ॥ निर्जने भीतिजनने निर्भये वशमास्थिता । कस्य त्वमपि केनात्र निवस्येकला कथम् ॥ २३ ॥ पृष्टैव प्राह सा कन्या राजपुत्रमनिन्दिता । स्वागतन्ते राजपुत्र विष्टरं प्रतिपद्यताम् ॥ २४ ॥
सैनिकोंमेंसे किन्हींने वृक्षोंका, किन्हींने शिलाओंका और किन्हींने गुफाओंका आश्रय लिया। दोनों राजकुमार भी घोड़ोंपर चढ़े हुए दूर निकल गये ॥ १६ ॥ उनमेंसे हेमचूड किसी तपस्वियोंके आश्रममें पहुँच गया। वह बड़ा ही रमणीक था और उसमें केले तथा खजूरके वृक्ष लगे थे ॥ २० ॥ वहाँ उसने अग्निकी ज्वालाके समान तेजस्विनी एक सुन्दरी कन्या देखी । उसका शरीर तपाये हुए सुवर्णके समान बड़ा कान्तिमान् था ॥ २१ ॥ साक्षात् लक्ष्मीके समान रूपवती उस कन्याको देखकर राजपुत्रने कुछ मुसकाते हुए पूछा, “कमलानने ! तुम कौन हो ? निर्भये ! इस भयङ्कर निर्जन वनमें तुम विवश होकर किसलिये निवास कर रही हो ? तुम किसकी पुत्री हो ? यहाँ किसके साथ रहती हो ? इस समय अकेली क्यों हो ?” ॥ २२-२३ ॥ इस प्रकार पूछे जानेपर उस निर्दोष बालाने राजपुत्रसे कहा, “राजपुत्र ! आप, भले आये । आइये, आसनपर विराजिये ॥ २४ ॥