उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( iv ) ९. कर्मों की त्याज्यता का प्रतिपादन .... ... ४४-५० १०. गुरु के शरणागत होने का प्रतिपादन .... ... ५१-५३ ११. पदार्थविवेक-प्रतिपादन .... ... ५४-५६ १२. प्रबुद्ध मुमुक्षु के अनुसन्धान करने का प्रकार .... ... ५७-८१ १३. प्रकरणप्रतिपादित विषय का उपसंहार .... ... ८२-८९ १८. तत्त्वमसिप्रकरणम् (पृ० १८३-२५९) १. नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण के व्याज से प्रकरण-प्रतिपाद्य अर्थ एवं स्व-सम्प्रदाय की विशुद्धता का निरूपण .... .... १-२ २. 'तत्त्वमसि'-वाक्य से ही अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ज्ञान और आरोपित अनर्थ की निवृत्ति होती है .... .... ३-८ ३. प्रसंख्यानवादी (वाक्यानुचिन्तनवादी) का मत .... .... ९-१६ ४. स्व-सिद्धान्त का प्रतिपादन .... .... १९-२३ ५. 'आत्मा' कभी प्रत्यय का विषय नहीं होता .... .... २४-२७ ६. 'आत्मा' कभी शब्द का विषय नहीं .... .... २८-३२ ७. आभास की अनिर्वचनीयता .... .... ३३ ८. एकदेशियों के मत .... .... ३४-३६ ९. आत्माभासनिरूपणपूर्वक चिच्छायावादिप्रभृतियों के मत का निराकरण .... .... ३७-५० १०. आत्मा में 'जानाति' आदि शब्दव्यवहार की अनुपपत्ति की शंका .... .... ५१-५६ ११. उस शंका का परिहार .... ... ५७-६७ १२. बुद्धि के विषय में तार्किक और बौद्ध आदि के मतों का निरसन .... .... ६८-७४ १३. आभास के विषय में शंका और उसका परिहार .... ... ७५-९० १४. 'युष्मद्' और 'अस्मद्' का विवेक .... .. ९१-९८ १५. तत्त्वज्ञान होनेपर पुरुष में फल के समान महावाक्य से ज्ञान पैदा होता है ... ... ९९-१०४ १६. ज्ञातव्य अर्थ के स्वरूप का निरूपण ... ... १०५-१४० १७. विज्ञानवादी बौद्ध के मत का खंडन ... ... १४१-१५२ १८. प्रत्यक्ष और अध्यक्ष—दोनों का सम्बन्ध क्या है? ... .... १५३-१६० १९. विवेक और अविवेक—दोनों के बाध्य-बाधक भाव का निरूपण .... ... १६१-१७२ २०. 'तत्' और 'त्वम्' दोनों की एकार्थनिष्ठता रहने पर पर्याय की शंका और उसका परिहार ... ... १७३-१८० २१. 'त्वम्' पदार्थ का विचार .... ... १८१-१८३ २२. 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य के अर्थ का विचार .... .... १८४-२०५ २३. प्रकारान्तर से प्रसंख्यानप्राप्ति का निरास ... ... २०६-२२९ २४. प्रकरणप्रतिपादित अर्थ का उपसंहार ... ... २३०-२३३ १९. तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् (पृ० २६०-२७२) १. संसार में मनोध्यास कारणता प्रकाशित करने के लिए आत्मा और मन का संवाद ... ... १-८ २. आत्मा का अद्वितीयत्त्व .... .... ९-१२ ३. आत्मा विकल्पना आदि का विषय नहीं है ... ... १३ ४. अद्वैत का निश्चय करने में विचार की कारणता ... ... १४-१८ ५. उक्तार्थ के निश्चय से रहित लोगों को अनर्थ की प्राप्ति ... ... १९-२०