भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ८७ हृदयस्पर्शिनी कदाचित् किसी आत्मवित् को विक्षेप (असमाधान) हो तो उसे दूर करने के लिए उसे कुछ कार्यानुष्ठान करना ही होगा । अर्थात्- 'तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्याऽऽसने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये'१ ॥ इत्यादि भगवद्वचन के अनुसार मनःसमाधान के द्वारा आत्मशुद्धि सम्पादन करना तो अभी अवशिष्ट ही है, इस आशंका पर यह कह सकते हैं कि आत्मशुद्धि तो पहले से ही सिद्ध है, आत्मशुद्धिसम्पादन करने का यह अवसर नहीं है । असमाधि का अर्थ 'विकार' है । और विकार उपाधि से होता है । एवंच विकार की हेतुभूत उपाधि से रहित होने के कारण आत्मा सर्वदा निर्विकार ही है, उसे आत्मशुद्धि की अब क्या आवश्यकता होगी ? मैं निर्विकार विशुद्ध ब्रह्मस्वरूप अपने में कभी कोई विक्षेप नहीं देखता, और सर्वथा पापरहित होने के कारण कुछ शोधन करने के योग्य भी नहीं समझता ॥ ३५ ॥ गन्तव्यं च तथा नैव सर्वगस्याऽचलस्य च । नोर्ध्वं नाधस्तिरो वापि निष्कलस्यागुणत्वतः ॥ ३६॥ गन्तव्यमिति--मैं सर्वगत और निश्चल हूँ । अतः मेरे लिये कोई गन्तव्य देश नहीं है। उसी तरह निर्गुण होने के कारण मैं निरवयव हूँ, अतएव मुझमें कुछ ऊपर-नीचे अथवा इधर-उधर भी नहीं है ॥ ३६ ॥ हृदयस्पर्शिनी शोधन करने योग्य किसी वस्तु को मैं नहीं देख रहा हूँ, क्योंकि मैं आत्मवित्, नित्य निवृत्तकल्मष हूँ । 'मैं आत्मवस्तु के सिवाय अन्य किसी वस्तु को नहीं देखता हूँ'—यह कथन ठीक नहीं प्रतीत हो रहा है, क्योंकि गन्तव्य- स्थान ब्रह्मलोकादि और गमनसाधन जो अर्चिरादिमार्ग—उसको जानना तो ब्रह्मवित् के लिये भी आवश्यक है। अतः ज्ञातव्य आत्मवस्तु के अतिरिक्त गन्तव्य और गमनसाधन भी ज्ञातव्य है, यह शंका हो सकती है, किन्तु उसका समाधान यह है—सगुणब्रह्मवित् को वह हो सकता है, निर्गुणब्रह्मवित् के लिए वह नहीं है । 'गन्तव्यम्' का भाव और कर्म में तन्त्रेण ग्रहण होगा । तथाच सर्वगत (सर्वत्र व्यापक) होने से चलन (हिलने) का सामर्थ्य नहीं है, उसके न होने से मैं गन्तव्य (गम धात्वर्थ जो गमन) को नहीं जानता, तथा 'गन्तव्य' अर्थात् गति (गमन) के द्वारा प्राप्तव्य देशरूप स्थानविशेष को भी नहीं लक्षित कर रहा हूँ । अर्थात् सर्वगत होने से निश्चल हूँ, इस कारण मेरे लिये कोई गन्तव्य देश नहीं है। और निर्गुण (अगुण) होने से मैं निरवयव हूँ। यदि यहाँ 'निर्गुण' न कहकर केवल 'निरवयव' कहते तो उसका 'निष्कलत्व' (पूर्णत्व) सिद्ध न हो पाता । क्योंकि कुछ लोगों के अनुसार ज्ञान, सुख आदि गुणात्मक अवयव उसके होने से उसे निरवयव नहीं कहा जा सकेगा । अतः निष्कलत्व को बताने के लिये 'अगुणत्वतः' (निर्गुण) कहना पड़ा । यह जो कहा गया था कि मेरा कोई प्राप्तव्य देश नहीं है, उसका कारण यह है कि देश-भेद हो तो गन्तव्य आदि स्थान का विभाग हो सके । मेरे लिये तो ऊपर-नीचे अथवा सामने-पीछे, दक्षिण, उत्तर कोई दिग्‌विभाग नहीं है । क्योंकि मैं तो पूर्ण (निष्कल) हूँ। निष्कल इस कारण हूँ कि मैं ज्ञानस्वरूप, सुखस्वरूप हूँ, ज्ञान, सुख आदि मेरे गुण नहीं हैं। मैं तो असंग हूँ, मुझ असंग में संसर्गी गुणों का रहना संभव नहीं है। अतः जैसे दिग्भेद न होने से मेरा कोई गन्तव्य स्थान नहीं, वैसे ही गुण से भी विभागशून्य होने के कारण मेरा कोई गन्तव्य स्थान नहीं है । और न गति (प्राप्ति) ही है। अतः आत्मवित् के लिये गन्तव्य तथा गमनसाधन के जानने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ३६ ॥ चिन्मात्रज्योतिषो नित्यं तमस्तस्मिन्न विद्यते । कथं कार्यं ममैवाद्य नित्यमुक्तस्य शिष्यते ॥ ३७॥ चिन्मात्रेति-जो सर्वदा चिन्मात्र, ज्योतिःस्वरूप है, उसमें (आत्मा में) अज्ञान (तम) भी नहीं है, तब नित्यमुक्त मेरे लिये अब भी कोई कर्तव्य कैसे शेष रह सकता है ? ॥ ३७ ॥ १. (भ. गी. ६।१२ )