भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

९० उपदेशसाहस्री (चेतन) से ही प्रकाश्य हैं। जिस प्रकार ये बाह्य रसादि किसी अन्य के दृश्य हैं, उसी प्रकार दृश्य होने से शारीरिक रसादि भी परप्रकाशय ही हैं। तथाच अनुमान-प्रयोग इस प्रकार होगा—'दैहिका रसादयः परेण दृश्याः दृश्यत्वात् बाह्य रसादिवत्।' तथैव 'इमे'—यह उपनय और 'तस्मात्तथा'—यह निगमन है। एवं च आत्मा, स्थूल देह से भिन्न है ॥ ४१॥ अहम्ममेत्येषणयत्नविक्रियासुखादयस्तद्वदिह प्रदृश्यतः । दृश्यत्वयोगाच्च परस्परेण ते न दृश्यतां यान्ति ततः परो भवान्* ॥ ४२ ॥ अहमिति—उसी तरह व्यवहार में अहंकार, ममता, इच्छा, यत्न, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादि विकार और सुख- दुःखादि भी दृश्यरूप होने से स्वयं प्रकाश नहीं हैं, और उनमें दृश्यत्व होने के कारण ही वे परस्पर भी एक दूसरे को प्रकाशित नहीं कर सकते। अतः इनके संघात रूप लिङ्गशरीर से आप (आत्मा) पृथक् (भिन्न) ही हैं ॥ ४२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक के द्वारा पञ्चभूतात्मक स्थूल शरीर से उसके द्रष्टा आत्मा को पृथक् (अतिरिक्त) सिद्ध करके, अब सूक्ष्मदेह से भी उसे (आत्मा को) पृथक् सिद्ध कर रहे हैं। अहंकार, ममता, इच्छा, यत्न, (कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि) विकार, और सुखादि (दुःख, मोह, द्वेष प्रभृति) ये सब 'मेरे' (मम) शब्द से निर्दिश्यमान मनोवृत्तिरूप हैं, उसी तरह पूर्वनिर्दिष्ट शब्दादि विषयों के समान ये भी स्वयम्प्रकाश (अनन्यवेदन) नहीं हैं। क्योंकि लोकव्यवहार में ये सभी दृश्य हैं (दर्शनक्रिया के कर्म हैं)। अतः इन्हें स्वयम्प्रकाश न कहना उचित ही है। तथा ये परस्पर भी एक दूसरे के दृश्य नहीं हो पाते। अभिप्राय यह है—स्थूल-देह के समान सूक्ष्म-देहात्मक अहंकारादि भी व्यवहार में स्वतः सिद्ध नहीं हैं, और उसी कारण वे परस्पर भी एक दूसरे को नहीं दिखाई पड़ते। एवं च स्वयं से भी स्वयं का ग्रहण न कर- पाने से तथा परस्पर भी एक-दूसरे से एक-दूसरे का ग्रहण न कर पाने से परिशेषात् उन सभी का ग्राहक (द्रष्टा), उन अहंकारादिकों से (अहंकारादिकों के संघात रूप सूक्ष्म देह=लिगशरीर से) अतिरिक्त (पृथक्) ही है ॥ ४२ ॥ अहंक्रियाद्या हि समस्तविक्रिया सकर्तृ का कर्मफलेन संहता । चितिस्वरूपेण समन्ततोऽर्कवत् प्रकाश्यमानाऽसिततात्मनो ह्यतः ॥ ४३ ॥ अहंक्रियाद्या इति—अहङ्कारादि सम्पूर्ण विकार सकर्तृक और कर्मफल से संहत हैं, और सूर्य के समान सर्वदा चेतनस्वरूप आत्मा से ही प्रकाशित होते हैं अतः आत्मा बन्धनरहित है, यह सिद्ध होता है। अहंकारादि उसे बाँध नहीं सकते, क्योंकि वे आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित हुआ करते हैं ॥ ४३ ॥ हृदयस्पर्शिनी तथापि पुनः जिज्ञासा होती है कि उपर्युक्त प्रकार से यद्यपि स्थूल-सूक्ष्म दोनों देहों (शरीरों) का ग्राहक (द्रष्टा) होने से उन दोनों शरीरों से अतिरिक्त ही आत्मा है, तथापि उनके साथ उस (आत्मा) की सम्बन्धप्रतीति तो सभी को होती है, तब उसे (आत्मा को) नित्यमुक्त कैसे कहा जायगा ? उक्त जिज्ञासा का समाधान इस प्रकार किया जाता है कि अहंकारादि सम्पूर्ण विकार सकर्तृक और कर्मफल से संहत है, तथा सूर्य के समान चेतनस्वरूप आत्मा से ही सर्वथा प्रकाशित होते रहते हैं। उस कारण आत्मा की अबद्धता (बन्धनशून्यता) सिद्ध है। स्थूल- सूक्ष्म देहात्मक विकार (विक्रिया) के साथ प्रतीयमान सम्बन्ध भी दृश्य है, ऐसी स्थिति में वह (सम्बन्ध) द्रष्टा का धर्म कैसे हो सकता है ? आत्मा तो उस सम्बन्ध का भी साक्षी (द्रष्टा) है। विकार और तत्सम्बन्ध आदि ये स्वयं आत्मचैतन्य से प्रकाशित होते रहते हैं, अतः वे उसे कैसे बाँध सकेंगे ? अतः आत्मा सदा-सर्वदा नित्य मुक्त ही है ॥ ४३ ॥ दृशिस्वरूपेण हि सर्वदेहिनां वियद्यथा व्याप्य मनांस्यवस्थितः । अतो न तस्मादपरोऽस्ति वेदिता परोऽपि तस्मादत एक ईश्वरः ॥४४॥

  • भवेत्—पाठान्तरम् ।