भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०१ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि अपनी आत्मा को सर्वत्र समान रूप से देखना भगवान् वासुदेव श्रीकृष्ण के लिये तो ठीक हो सकता है, क्योंकि वह उपाधियों के प्रति ममता और अहंकार से रहित हैं, किन्तु मुमुक्षु पुरुष तो उपाधियों के प्रति ममता और अहंकार सहित होता है । अतः वह अपनी आत्मा को सर्वत्र समभाव से कैसे देख सकेगा ? उत्तर यह है कि जिस प्रकार बाहर दिखाई देनेवाले अन्य शरीरों में ममभाव (ममता) अहंभाव (अहंता=अहंकार) इष्ट नहीं रहता, क्योंकि वे सब दृश्य होने से उनमें अनात्मत्व का निश्चय रहता है। उसी प्रकार स्वत्वेन अभिमत इस (अपने) शरीर में भी ममता, अहंता करना इष्ट नहीं है। क्योंकि अपने और दूसरे उभयविध शरीरों में आत्मा की बुद्धिसाक्षिता समान (एक-सी) है। इस कारण आत्मतत्त्व का आलोचन (विचार) करते समय ममता-अहंकार आदि को अवकाश न होने के कारण भगवान् वासुदेव श्रीकृष्ण के समान सर्वत्र समान रूप से अपनी आत्मा को देखना उचित ही है ।। १२ ।। रूपसंस्कारतुल्याधी रागद्वेषौ भयं च यत् । गृह्यते धीश्रयं तस्माज्ज्ञाता शुद्धोऽभयः सदा ॥१३॥ रूपेति—यदि किसी को यह आशंका हो कि राग, द्वेष और भय आदि की उपलब्धि तो सभी को हुआ करती है। अतः 'आत्मा' में अभिमान का सर्वथा अभाव कैसे हो सकता है ? तो इसका समाधान यह है कि ये जो राग, द्वेष और भय आदि हैं, वे भी सब नीलादिरूप संस्कार के समान साश्रय (आश्रय वाले ) हैं, अर्थात् वे सभी, बुद्धि के ही आश्रित रहते हैं, किन्तु उन सबका साक्षी जो आत्मा है, वह सर्वदा शुद्ध और भयरहित है ।। १३ ।। हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि राग, द्वेष, और भय आदि की उपलब्धि होने से आत्मा में अभिमान (अहंकार), ममता आदि का सर्वथा अभाव कैसे हो सकता है ? उनका अभाव इस तरह समझा जा सकता है कि ये जो राग, द्वेष और भय हैं, वे नीलादिरूप संस्कार के समान आश्रय (आधि) वाले हैं, क्योंकि ये सब बुद्धि के ही आश्रित देखे जाते हैं । स्वाश्रय में पूर्व उद्भूतावस्था के समान अन्य अवस्था के आपादक अतीन्द्रिय धर्म को संस्कार कहते हैं । तत्तश्च रूपाद्याकार में परिणत अन्तःकरण में रूपादि संस्कार, पुनरपि रूपाद्याकार परिणाम में हेतु बनता है, और वहींपर रूपादि दर्शननिमित्त राग-द्वेष और तन्निमित्तक भय भी वहींपर होता है। श्रुति भी कह रही है—"कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव१”। राग-द्वेष-भय ये तीनों बुद्धि के ही आश्रित रहते हैं अर्थात् तीनों का आश्रय बुद्धि ही है। इन तीनों को आत्मा जानता है, आत्मा तीनों का ज्ञाता (साक्षी) है। ये आत्मा के आश्रित नहीं रहते । अतः आत्मा तो सर्वदा शुद्ध (रागादि से रहित) और अभय है ।। १३ ।। यन्मनास्तन्मयोऽन्यत्वे नात्मत्वात्सौ क्रियाऽऽत्मनि । आत्मत्वे चानपेक्षत्वात्सापेक्षं हि न तत्स्वयम् ॥१४॥ यन्मना इति—ध्याता और ध्येय का यदि भेद रहता है, तो ध्याता जिस प्रकार के ध्येय में अपना मन लगाता है, तद्रूप ही वह हो जाता है । किन्तु आत्मप्राप्ति के लिये किसी ध्यान आदि क्रिया करने की अपेक्षा नहीं है । क्योंकि आत्मा तो मोक्षस्वरूप ब्रह्म ही है, अतः उसे किसी क्रिया की अपेक्षा नहीं रहती। यदि उसे भी सापेक्ष कहा जाय तो उसमें आत्मस्वरूपता की स्थिति नहीं होगी ।। १४ ।। हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक के द्वारा आत्मा को सर्वदा शुद्ध बताया गया है, किन्तु वह सर्वदा शुद्ध कैसे होगा ? श्रुति भी कह रही है—"यथा क्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति२”। उसी तरह स्मृति भी कह रही है— १. (बृ. उ. १।५।३ ) २. (छां. उ. ३।१४।१ )