उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 364 में से
संदर्भ में पढ़ें१०४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आत्मा शुद्धस्वरूप सिद्ध होने पर भी उपाधि सम्बन्ध से वह अन्यथा प्रतीत होता है। अतः मुमुक्षु को चाहिए कि वह आत्मा को ब्रह्मरूप में समझने के लिए पदार्थ-विवेक (पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का विचार) करे। आत्मा की प्रतीति 'अहम्'—(मैं) के आकार में होती है। इस प्रतीति में मैं कृश हूँ, स्थूल हूँ इस प्रकार भूतों के संघात रूप स्थूल शरीर का स्फुरण होता रहता है। उसी तरह 'मैं' द्रष्टा, श्रोता, रसयिता, काण, बधिर हूँ—इस प्रकार 'मैं' कहने से इन्द्रियों (करणों) का भी उल्लेख होता रहता है। अतः मुमुक्षु को चिन्तन करना होगा कि क्या 'मैं' भूतों का संघात (समूह-समुदाय) रूप स्थूल शरीर हूँ? या 'मैं' इन्द्रिय (करण) संघात रूप हूँ? यदि 'मैं' इन्द्रियों का संघात रूप हूँ, तो पृथक्-पृथक् इन्द्रियों के प्रति पृथक्-पृथक् अहंकार (प्रत्येक इन्द्रिय के प्रति अहंकार) होने से क्या 'मैं' पृथक्-पृथक् प्रत्येक इन्द्रियस्वरूप हूँ? अथवा एक ही शरीर में अनेक रूपों में रहने पर कदाचित् वैमत्य (विरोध) होने की भी संभावना रहने से भोगव्यवस्था नहीं बन पायेगी, इस कारण उन इन्द्रियों में से कोई एक हूँ? या इन्द्रिय संघात से भिन्न कोई अन्य हूँ, उन सबका अधिष्ठाता हूँ? यदि उनमें से ही कोई अन्यतम हूँ, तो क्या अन्तःकरण, प्राण आदि में से ही कोई एक हूँ? किंवा उनका साक्षी होकर उनसे विलक्षण स्वरूप का हूँ? इस रीति से विचार करना चाहिए ॥ १९ ॥ व्यस्तं नाहं समस्तं वा भूतमिन्द्रियमेव वा । ज्ञेयत्वात्करणत्वाच्च ज्ञाताऽन्योऽस्माद्घटादिवत् ॥२०॥ व्यस्तमिति—विचारने पर यह निश्चय अवश्य होगा कि मैं भूत नहीं हूँ, तथा इन्द्रिय नहीं हूँ, तथा व्यस्त अथवा समस्त भी नहीं हूँ, क्योंकि ये सब घट आदि के समान ज्ञेय और करण रूप हैं। मैं तो इनका ज्ञाता हूँ। अतः मैं इनसे भिन्न हूँ ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार विचार करने पर पदार्थविवेकरूप फल की प्राप्ति होती है। उपर्युक्त रीति से विचारने पर मुमुक्षु को यह निश्चय हो जाता है कि 'मैं' न भूत हूँ, न इन्द्रिय हूँ तथा न व्यस्त (पृथक्-पृथक्) हूँ, न समस्त हूँ, क्योंकि ये सभी घटादि के समान अचेतन (जड़) हैं, और कुठार आदि के समान कारणरूप (साधनरूप) हैं। तस्मात् 'मैं' तो इन सबका ज्ञाता हूँ, चेतन हूँ, इन सभी अन्तःकरण, प्राण आदि जड़ पदार्थों से भिन्न हूँ, इस प्रकार द्रष्टा और दृश्य का अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा आलोचन करते हुए विवेक करना चाहिए ॥ २० ॥ आत्मागनेरिन्धनं बुद्धिरविद्याकामकर्मभिः । दीपिता प्रज्वलत्येषा द्वारैः श्रोत्रादिभिः सदा ॥२१॥ आत्मागनेरिति—आत्मा रूप अग्नि का ईंधन—'बुद्धि' है। यह बुद्धिरूप ईंधन अविद्या, काम और कर्मों से दीपित होकर श्रोत्रादि के द्वारा सर्वदा प्रज्वलित होता रहता है ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक से पदार्थविवेक करने की रीति बताई गई। अब २१ से २६ तक के श्लोकों से साक्षी और साक्ष्य का अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा आलोचन करते हुए अवस्थात्रय (तीन अवस्थाओं) का विवेक और उसके द्वारा तत्साक्षी तुरीय का अधिगम करने का (ज्ञान का) प्रकार बता रहे हैं—अग्नि को किसी विशेष आकार में अभिव्यक्त करने में कारण ईंधन होता है। उसी तरह आत्मचैतन्य को विशेष आकार में अभिव्यक्त करनेवाली यह 'बुद्धि' है। अग्नि- स्थानापन्न आत्मचैतन्य को और ईंधनस्थानापन्न बुद्धि को समझना चाहिए। बुद्धि को ईंधनस्थानापन्न इसलिए कहते हैं कि जैसे काष्ठादि ईंधन के द्वारा अग्नि को प्रकाशित किया जाता है, वैसे ही यह बुद्धि, आत्मचैतन्य को व्यवहार- योग्य बनाती है। 'इध्यते प्रकाश्यते व्यवहारयोग्यः क्रियते अनया इति इन्धना बुद्धिः'। जैसे वायु के कारण अग्निस्थित ईंधन प्रज्वलित हो उठता है, उसी तरह अविद्या काम कर्म के कारण उत्तेजित (दीपित) हुई वह बुद्धि, चैतन्यग्रस्त होने