भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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१०६ उपदेशसाहस्री समय वे सब दृश्यरूप में ही स्थित रहते हैं। उस समय आत्मा की कोई अन्य उपाधि भी नहीं होती। उस समय सूर्यादि बाह्य ज्योतियों का भी अभाव रहता है। उस समय स्वयंज्योति आत्मा ही विषयों का प्रकाशक (साक्षी) होता है। इसी अभिप्राय को श्रुति भी बता रही है—"दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च१", "अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति२" इति ॥ २४ ॥ विषया वासना वापि चोद्यन्ते नैव कर्मभिः । यदा बुद्धौ तदा ज्ञेयः प्राज्ञ आत्मा ह्यनन्यदृक् ॥२५॥ विषया इति—जिस समय कर्मों के द्वारा विषय (स्थूल) तथा वासनाओं (सूक्ष्म) की भी अन्तःकरण में उद्भूति न हो, उस समय आत्मा (अपने) व्यतिरिक्त विषय अथवा वासना को न देखने के कारण उसे (आत्मा को) प्राज्ञ समझना चाहिये ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्वप्नावस्था बताने के बाद अब सुषुप्ति अवस्था को बताते हैं—जिस समय बुद्धि (अन्तःकरण) में कर्मों के द्वारा स्थूल विषय तथा सूक्ष्म वासनाएँ, जो स्वप्न में दृश्य रहती हैं, उनका भी उद्बोध; न हो, उस समय वह अपने से भिन्न किसी भी विषय को या वासना को नहीं देखता है, इस कारण उसे अनन्यदृक् (अपरिच्छिन्नदर्शी) अर्थात् 'प्राज्ञ' शब्द से कहा जाता है। 'प्रज्ञातिशयात् तदा प्राज्ञः' इस व्युत्पत्ति से उसे 'प्राज्ञ' कहा गया है। उपर्युक्त तीनों अवस्थाओं को तथा तत्कालीन चैतन्य एवं उनके कोष और शरीर को समझने के लिए निम्नलिखित सरल प्रकार यह है— १. जाग्रत् अवस्था के समय स्थित चैतन्य—समष्टि को 'वैश्वानर' और चैतन्य—व्यष्टि को 'विश्व' कहते हैं, और उनका कोष 'अन्नमय' कोष और शरीर 'स्थूल शरीर' होता है। २. स्वप्न अवस्था के समय स्थित चैतन्य—समष्टि को 'सूत्रात्मा', और चैतन्य—व्यष्टि को 'तैजस' कहते हैं, और उनके तीन कोष 'मनोमय', 'प्राणमय', 'विज्ञानमय' होते हैं, और शरीर 'सूक्ष्म शरीर' होता है। ३. सुषुप्ति अवस्था के समय स्थित चैतन्य—समष्टि को 'ईश्वर' और चैतन्य—व्यष्टि को 'प्राज्ञ' कहते हैं, और उनका कोष 'आनन्दमय कोष' और शरीर 'कारणशरीर' होता है ॥ २५ ॥ मनोबुद्धीन्द्रियाणां च* ह्यवस्थाः कर्मचोदिताः । चैतन्येनैव भास्यन्ते रविणेव घटादयः ॥२६॥ मनोबुद्धीन्द्रियाणामिति—जिस प्रकार घटादि पदार्थ सूर्य से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार कर्म के द्वारा उद्बुद्ध हुईं ये मन, बुद्धि और इन्द्रियों की अवस्थाएँ 'चैतन्य=आत्मा' से ही प्रकाशित की जाती हैं। मन की अवस्था 'स्वप्न', बुद्धि की अवस्था 'सुषुप्ति', और इन्द्रियों की अवस्था 'जाग्रत्' कहलाती है ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार तीन अवस्थाओं तथा तदवस्थ आत्मा का द्रष्टा-दृश्यभाव से विवेचन करने के बाद अब अभिमानी सहित अवस्थात्रय के साक्षीरूप में विश्वावित्रय की अपेक्षा तुरीय (चतुर्थ) नित्यविज्ञप्ति (नित्यविज्ञान) स्वभाववाले प्रत्यक् आत्मा को बता रहे हैं— जिस प्रकार घट-पटादि पदार्थ, सूर्य (रवि) से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार कर्म के द्वारा उद्बुद्ध होने- वाली ये मन, बुद्धि और इन्द्रियों की अवस्थाएँ आत्मचैतन्य से ही प्रकाशित होती हैं। इन्द्रियों की अवस्था जागरण (जाग्रत्), मन की अवस्था स्वप्न, और बुद्धि की अवस्था यानी कारणावस्था सुषुप्ति कही जाती है ॥ २६ ॥ १. (बृ. उ. ४।३।१५, १६, २४, २७) २. (बृ. उ. ४।३।९,१४)

  • या अव०—पाठान्तरम् ।