भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 364 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

१०८ उपदेशसाहस्री चेतनोऽचेतनो वापि कर्ताऽकर्ता गतोऽगतः । बद्धो मुक्तस्तथा चैकोऽनेकः शुद्धोऽन्यथेति वा ॥३०॥ चेतन इति—भिन्न-भिन्न मतवादी विद्वान् आत्मा को चेतन या अचेतन, कर्ता या अकर्ता, व्यापक या अव्यापक, बद्ध या मुक्त, एक या अनेक तथा शुद्ध या शबल इस प्रकार भिन्न-भिन्न रीति से बताते हैं ।। ३० ।। हृदयस्पर्शिनी मन और वाणी से उसकी अगम्यता को बताते हैं—'अहम्' यहाँ पर शब्द और प्रत्यय दोनों पराग्व्यावृत्त हुए प्रत्यक् आत्मा को बताते हैं, इसमें किसी का विवाद नहीं है। ये दोनों (शब्द और प्रत्यय) शुद्ध आत्मा को ही यदि विषय करते हों तो प्रत्यक्षतः उपलब्ध घटादि के समान किसी भी वादी को विप्रतिपत्ति ही नहीं होगी। किन्तु आत्मा के संबन्ध में वादियों की अनेक विप्रतिपत्तियाँ हैं। वेदबाह्य लोगों का कहना है कि देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि में से अन्यतम अचेतन (जड़) या चेतन कोई भी 'आत्मा' है। वेदवादियों का कहना है कि उपर्युक्त समस्त अचेतनों (जड़ों) से भिन्न (अन्य) कोई चेतन आत्मा है। उनमें भी नैयायिक लोग आत्मा को कर्ता के रूप में बताते हैं और सांख्य वाले उसे अकर्ता कहते हैं। जैन दार्शनिक आत्मा को शरीरपरिमाण का मानते हैं। किन्तु रामानुज आदि वैष्णवाचार्य उसे अणु-परिमाण कहते हैं। कुछ लोग जीव को बद्ध और ईश्वर को मुक्त कहते हैं। तथा वेदान्ती केवल 'एक आत्मा' स्वीकार करते हैं। किन्तु सांख्य-नैयायिकादि अनेक आत्माओं को मानते हैं। वेदान्ती और सांख्यवादी आत्मा को शुद्ध (रागादिगुण रहित) कहते हैं, किन्तु नैयायिकादि लोग उसके विपरीत अर्थात् आत्मा को रागादि गुण सहित (शबल) बताते हैं। इस प्रकार एक आत्मा को लेकर भिन्न-भिन्न वादियों के भिन्न-भिन्न मत उपलब्ध होते हैं ।। ३० ।। अप्राप्यैव निवर्तन्ते *वाचो धीभिः सहैव तु । निर्गुणत्वात् क्रियाभावाद्विशेषणामभावतः ॥३१॥ अप्राप्यैवेति—आत्मा, निर्गुण होने के कारण निष्क्रिय है, यानी उसमें क्रिया का अभाव है तथा जाति आदि स्वगत और गो-सुवर्ण आदि बाह्य विशेषणों (विशेषों) का भी उसमें अभाव है। अतएव बुद्धि के सहित वाणी (शब्द) उसे (आत्मा को) प्राप्त किये बिना ही लौट आती है ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी वाणी और बुद्धि, आत्मतत्त्व तक बिना पहुँचे ही क्यों परावृत्त होती (लौटती) हैं ? वास्तविक प्रवृत्तिद्वार (प्रवृत्तिबीज) के प्राप्त न होने से उन्हें वापस आना पड़ता है। क्योंकि आत्मा निर्गुण है, उसमें क्रिया का अभाव है, तथा जाति आदि स्वगत एवं गो-सुवर्णादि बाह्य विशेषणों का भी अभाव है। अभिप्राय यह है कि आत्मा रूपादि- गुणों से शून्य होने के कारण बाह्येन्द्रियद्वारक बुद्धि के द्वारा उसकी प्राप्ति नहीं हो पाती, और मन भी बाह्येन्द्रियों से उपलब्ध कराये गये विषयों के अतिरिक्त विषयों को स्वतन्त्रतया प्राप्त करने (देखने) में असमर्थ है। अतः गोचर न हो पाने वाले आत्मा को वह (मन) नहीं प्राप्त कर पाता। अथवा आत्मा, निष्क्रिय होने से मन का विषय नहीं हो पाता। जैसे घट आदि वस्तुओं के द्वारा अनुगत रहने पर भी क्रियाहीन अनवच्छिन्न (अपरिमित) आकाश में किसी अपूर्व (नवीन) धर्म की उत्पत्ति नहीं होती, वैसे ही क्रियाहीन अनवच्छिन्न आत्मवस्तु में किसी क्रियावान् की अनुगति होने मात्र से अपूर्व धर्म की उत्पत्ति का होना संभव नहीं है। व्यावहारिक ज्ञान तो मनःसंयोगजन्य होता है। आत्मा तक मन की पहुँच ही न हो पाने से उसकी मन से भी अवगति नहीं हो पाती। तथा बाह्य गोधनादि विशेष अथवा स्वगत जात्यादिरूप प्रवृत्तिनिमित्तों के न होने से शब्द भी आत्मा तक नहीं पहुँच पाता। क्योंकि शब्द की प्रवृत्ति में हेतुभूत षष्ठी आदि विभक्तियों और बुद्धि की प्रवृत्ति में हेतुभूत रूपादि के वस्तुतः न होने पर भी आरोपित रूप तथा षष्ठी आदि विभक्तिसम्बन्ध के कारण समस्त व्यवहार होता रहता है। आत्मा के विषय में वादियों के जितने भी मत हैं, वे सब अयथाभूत आत्मा तक ही सीमित हैं, अतः 'अहम्' यह शब्द-प्रत्यय भी शुद्ध आत्मा को बताने

  • वचो०—पाठान्तरम् ।