भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

११२ उपदेशसाहस्री स्वरूपेति-आत्मा तो मेरा स्वरूप है और मुझसे सर्वथा व्यवधानरहित है, तथा वह चैतन्यप्रकाशस्वरूप है, इसलिये उसे किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं रहती। अतः वह सर्वदा मुझे ज्ञात ही है। क्योंकि वह स्वयंप्रकाश और निरावरण है। अतः वह नित्य ज्ञानस्वरूप है, किसी भी अवस्था में वह अज्ञात नहीं है ॥ ४० ॥ हृदयस्पशिनी उपर्युक्त श्लोक के अनुसार ज्ञेयत्व का उसमें संभव नहीं है, तो 'आत्मन्येवात्मानं पश्येत्' - आत्मा में ही आत्मा को देखे इत्यादि उपदेश कैसे किया है ? यह शंका होती है, उसके समाधान में कहते हैं कि अविषयत्वेन आत्म- तत्त्वविज्ञान का आविर्भाव मात्र होता है। आत्मतत्त्व को विषय बनाकर उसका ज्ञान नहीं होता । क्योंकि 'यस्यामतं- तस्य मतं यस्य न वेद सः' यह श्रुति है। ज्ञाता से भिन्न जो पदार्थ, वे अन्य देश आदि से व्यवहित और जड़ होते हैं, उनके लिये ज्ञान आदि का व्यवहार होता है। नित्य चैतन्यस्वरूप में ज्ञान होने का व्यवहार संभव नहीं, क्योंकि उसका तो स्वतः स्फुरण होता ही रहता है ॥ ४० ॥ नान्येन ज्योतिषा कार्यं रवेरात्मप्रकाशने । स्वबोधान्नान्यबोधेच्छा बोधस्यात्मप्रकाशने ॥४१॥ नान्येनेति-जिस प्रकार सूर्य को अपना स्वरूप प्रकाशित करने के लिये किसी अन्य ज्योतिर्मय पदार्थ (प्रकाश) की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार बोध (ज्ञान) स्वरूप आत्मा को अपना बोध कराने के लिये आत्म- चैतन्य के अतिरिक्त किसी अन्य चैतन्य की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ४१ ॥ हृदयस्पशिनी जैसे सूर्य को अपना स्वरूप प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य ज्योतिर्मय पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही ज्ञानस्वरूप आत्मा को अपना ज्ञान (बोध) कराने के लिये आत्मचैतन्य के अतिरिक्त किसी अन्य चैतन्य की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ४१ ॥ न तस्यैवान्यतोऽपेक्षा स्वरूपं यस्य यद्‌भवेत् । प्रकाशान्तरदृश्यो न प्रकाशो ह्यस्ति कश्चन ॥४२॥ न तस्येति-जिस पदार्थ का जो स्वरूप होता है, उसे अपने स्वरूप को प्रकाशित करने के लिये किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती। ऐसा कोई भी प्रकाश नहीं है, जो किसी अन्य प्रकाश से प्रकाशित होता हो ॥ ४२ ॥ हृदयस्पशिनी जो जिसका स्वरूप होता है, उसकी सिद्धि के लिए उसे किसी दूसरे की आवश्यकता नहीं रहती। ऐसा कोई भी प्रकाश नहीं है, जो किसी अन्य प्रकाश से प्रकाशित होता हो। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा-'आत्मा न अन्यतो ज्ञानमपेक्षते तत्स्वरूपत्वात्, यद् यस्य स्वरूपं तत् न अन्यतस्तदपेक्षते, यथा प्रकाशरूपः सविता, न प्रकाशमन्यतोऽ- पेक्षते, तथा चायं, तस्मात्तथा। किंच- 'नात्मा प्रकाशान्तरदृश्यः, प्रकाशरूपत्वात्, आदित्यवत्' ॥ ४२ ॥ व्यक्तिः स्यादप्रकाशस्य प्रकाशात्मसमागमात् । प्रकाशस्त्वर्ककार्यः स्यादिति मिथ्यावचो ह्यतः ॥४३॥ व्यक्तिरिति-यदि यह कहें कि आत्मा, परप्रकाशय भले ही न हो किन्तु उसे स्वप्रकाशय तो कहना ही होगा, अर्थात् अपने प्रकाश का विषय तो वह होगा ही । किन्तु यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि जो वस्तु, प्रकाशशून्य (प्रकाशरहित ) होती है, उसी की अभिव्यक्ति, प्रकाशरूप वस्तु की सन्निधि होने पर हुआ करती है। इसलिये प्रकाश को सूर्य का कार्य समझना अर्थात् 'प्रकाश सूर्य का कार्य है' - यह वाक्य मिथ्या है ॥ ४३ ॥