भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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११४ उपदेशसाहस्री दग्धैवमुष्णः सत्तायां तद्वद्*बोधात्मनीष्यताम् । सत्येव यदुपार्थौ तु ज्ञाते सर्प इवोत्थिते ॥४७॥ दग्धैवमिति—जिस प्रकार उष्ण स्वभाववाला अग्नि, किसी बाह्य वस्तु के समीप रहने पर अपनी सत्ता- मात्र से उसका दाहक हो जाता है। उसी प्रकार बोध्य वस्तु के समीप रहने मात्र से आत्मा उसका बोद्धा कहलाता है। जैसे बिल के बाहर निकले हुए उपाधिभूत सर्प के ज्ञात होने पर ही सूर्य को उसका प्रकाशक कहा करते हैं। वैसे ही आत्मा का बोद्धृत्व भी औपाधिक ही है ॥ ४७ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा अर्थात् उपाधि के रहने पर ही ज्ञातृत्व व्यवहार, और उपाधि के न रहने पर उसका (ज्ञातृत्व व्यवहार का) न होना—इस अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा (‘तत्सत्त्वे तत्सत्त्वम्, तदभावे तदभावः’ यही अन्वय-व्यतिरेक का स्वरूप है) इस प्रकार ज्ञातृत्व औपाधिक है, यह बताने के लिये एक अन्य उदाहरण दे रहे हैं— जिस प्रकार उष्ण स्वभाववाला अग्नि दाह्य वस्तु के सन्निध रहने पर अपनी सत्तामात्र से उसका ( दाह्य वस्तु का ) दाहक होता है। अतः अग्नि में दाहकत्व औपाधिक कहा जाता है, उसी प्रकार बोध्य वस्तु की सन्निधि रहने पर अपनी सत्तामात्र से आत्मा में बोद्धृत्व (ज्ञातृत्व) समझना चाहिए। जिस तरह बिल से निकले हुए उपाधिभूत सर्प के ज्ञात होनेपर ही सूर्य उसका प्रकाशक कहा जाता है, सर्प के ज्ञात न रहने पर नहीं, उसी प्रकार उपाधि के (ज्ञेय पदार्थ के) ज्ञात होनेपर ही आत्मा को ज्ञाता कहा जाता है, अन्यथा नहीं । अतः आत्मा में ज्ञातृत्व ( बोद्धृत्व ) व्यवहार औपचारिक ही है ॥ ४७ ॥ ज्ञाताऽयत्नोऽपि तद्वज्ज्ञः कर्ता भ्रामकवद्‌भवेत् । स्वरूपेण स्वयं नात्मा ज्ञेयोऽज्ञेयोऽथवा ततः ॥४८॥ ज्ञातेति—जिस प्रकार प्रयत्न के बिना ही ज्ञानस्वरूप आत्मा सभी का ज्ञाता कहलाता है, उसी तरह भ्रामक (सूर्य और चुम्बक) के समान वह आत्मा कर्ता भी कहा जाता है। अतः स्वयं स्वरूप से तो आत्मा न ज्ञेय है और न अज्ञेय है ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक से आत्मा के औपाधिक ज्ञातृत्व को सूर्य के दृष्टान्त से बताकर, उसी दृष्टान्त से उसका (आत्मा का) कर्तृत्व भी औपाधिक है—उसे बता रहे हैं। जिस प्रकार यह ‘ज्ञ’ अर्थात् ज्ञानस्वरूप आत्मा, बिना प्रयत्न के ही सबका ज्ञाता है, उसी प्रकार स्वगत किसी विशेष के न रहने पर भी (स्वगतविशेषशून्य होने पर भी) भ्रामक के समान केवल अपनी सत्तामात्र से सन्निहित कारकों को प्रेरित करता हुआ क्रिया का कर्ता कहा जाता है। ‘भ्रामक’ शब्द से सूर्य या चुम्बक (अयस्कान्त) दोनों समझे जाते हैं। क्योंकि सोये हुए पुरुषों को अपनी सत्तामात्र से जगाकर कार्य में प्रवृत्त करने के कारण सूर्य को ‘भ्रामक’ कहते हैं। उसी तरह अपनी सत्तामात्र से सन्निहित लोहखण्ड को अपनी ओर आकर्षित कर लेने के कारण ‘चुम्बक’ को भी ‘भ्रामक’ कहते है। इस प्रकार ‘व्यक्तिः स्यादप्रकाशस्य’—(१५/४३) से आरंभ कर प्रसंगप्राप्त आत्मा के ज्ञानकर्मत्व-अकर्मत्व के द्वारा समर्थित उसके (आत्मा के) अज्ञेयत्व पक्ष और ज्ञेयत्व पक्ष का अब उपसंहार कर रहे हैं। पूर्व श्लोक में बता चुके हैं कि जैसे भ्रामक स्वगतचलनशून्य होकर भी सन्निहित लौह का प्रेरक होता है, उसी तरह आत्मा निश्चल रहता हुआ भी चिदाभासोपेत मोहादि परिणाम की दृष्टि से उसमें कर्तृत्व व्यवहार किया जाता है। किन्तु वास्तव में वह तो निर्विशेष है, स्वभाव से ही वह अलुप्तप्रकाशस्वरूप वाला है। उस कारण वह स्वयं स्वरूपतः ही (असाधारण स्वभाव वाला होने से ही) ज्ञानक्रिया से व्याप्त अर्थात् ज्ञेय नहीं होता, तथा अज्ञेय भी नहीं रहता अर्थात् व्यवहित वस्तु के समान ज्ञानप्रकाशरहित भी नहीं है। ‘अथवा’ शब्द से बता रहे हैं कि वस्तुतः वह आत्मा निर्विकार होने से न किसी का ज्ञाता है, और चैतन्यस्वरूप होने से न किसी का अज्ञाता है। तथा अध्यस्त कारकों का अधिष्ठान होने से उसे कर्ता भी कह देते हैं, और निर्व्यापार रहने से उसे कर्ता नहीं भी मानते । एवंच यह आत्मा, ज्ञाता भी नहीं, कर्ता भी नहीं, न वह ज्ञेय है, और न अज्ञेय है, न कार्य है, न प्राप्य है, न हेय है, इस प्रकार उसकी सर्वविशेषशून्यता सिद्ध हो जाती है ॥ ४८ ॥

  • बोद्धात्म०—पाठान्तरम्
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