भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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१२२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी दृष्टान्त को स्पष्ट कर रहे हैं—आत्मा में यदि अंशभेद को स्वीकार कर, उसके किसी अंश को गृहीता और किसी को ग्राह्य कहें तो वहाँ पर भी यह प्रश्न होगा कि उसका ग्राह्य अंश जड़ है या चेतन ? यदि चेतन है, तो वह किसी का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि चेतन तो प्रकाशक ही होता है, वह किसी का प्रकाश्य नहीं हुआ करता। यदि जड़ कहें तो प्रकाश और अन्धकार के समान चेतन और जड़ ये दो अत्यन्त विरुद्ध धर्म एक ही आत्मा में नहीं रह सकते। जिस प्रकार सूर्यादि ज्योतिर्मय पदार्थ प्रकाशक होने पर भी अपने को प्रकाश्यरूप में प्रकाशित नहीं करते, उसी प्रकार आत्मा में अंशभेद के स्वीकार करने पर भी चिन्मात्र रूप से उसमें समानता होने से वह अपने को ही नहीं देख सकता। अतः उसमें अंशभेद की कल्पना करके स्वयं को ही ग्राह्य-ग्राहकरूप मानना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है। अतः ग्राह्यांश को आत्मा नहीं कह सकते ॥ १२ ॥ यद्धर्मा यः पदार्थो न तस्यैवेयात्स कर्मताम् । न ह्यात्मानं दहत्यग्निस्तथा नैव प्रकाशयेत् ॥१३॥ यद्धर्मेति—जो पदार्थ जिस धर्म को धारण करता है, वह उसी धर्म का कर्म नहीं हुआ करता। जैसे अग्नि अपने को न तो जला ही सकता है और न प्रकाशित ही कर सकता है ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्वरूप से अथवा अंश के द्वारा यद्यपि वह अपने आप को नहीं देख पाता, तथापि स्वगुण के ज्ञान का वह कर्म हो सकता है। किन्तु यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि जो पदार्थ जिस धर्म से युक्त होता है, वह उसी धर्म का कर्म नहीं हुआ करता। तथाच जिस प्रकार अग्नि अपने को न तो दग्ध कर सकता है और न प्रकाशित ही कर सकता है, तद्वत् ज्ञानस्वभाव वाला आत्मा कभी भी ज्ञान का कर्म नहीं बन सकता। अनुमान-प्रयोग इस प्रकार कर सकते हैं— 'आत्मा न स्वीयधर्मव्याप्यः पदार्थत्वात् अग्निवत्।' अर्थात् आत्मा अपने प्रकाश का विषय नहीं बनता, वस्तु (पदार्थ) होने के कारण, वह्नि (अग्नि) की तरह। अतः आत्मा ग्राह्य (प्रकाश्य) नहीं है ॥ १३ ॥ एतेनैवात्मनाऽऽत्मानो* ग्रहो बुद्धेर्निराकृतः । †अंशोऽप्येवं समत्वाद्वि निर्भेदत्वान्न युज्यते ॥१४॥ एतेनेति—इस पूर्वोक्त युक्ति से बुद्धि को ही आत्मा मानने वाले बौद्धों के बुद्धि रूप आत्मा को अपने ही द्वारा ग्रहण किया जाना (ग्राह्य मानना) निरस्त हो जाता है। उसी तरह चिन्मात्र रूप से समान और भेदशून्य होने से आत्मा में अंशभेद की कल्पना करना भी युक्तिविरुद्ध है। क्योंकि आत्मा और उसकी दृश्यता का साजात्य चिन्मयता की दृष्टि से है। अर्थात् यह साजात्य परमार्थसत्ता की दृष्टि से है और प्रस्तुत कथन व्यावहारिक सत्ता की दृष्टि से है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पूर्वोक्त युक्ति से ही विज्ञानवादी बौद्धों के मत का भी खण्डन हो जाता है। विज्ञानवादी बौद्ध बुद्धि (ज्ञान) रूप आत्मा का अपने ही द्वारा (बुद्धि = ज्ञान से) ग्रहण होना मानते हैं। अर्थात् ज्ञान अपने आप को ही ग्रहण करता है, यानी उनके मत में वही ग्राहक और वही ग्राह्य माना गया है। उसका खण्डन उपर्युक्त दृष्टान्त से हो जाता है। और चिन्मात्ररूप से समान और भेदरहित होने के कारण आत्मा में अंश मानना भी युक्तिसंगत नहीं है। अर्थात् स्वरूप का स्वरूप से ही ग्राह्यत्व न हो सकने पर भी बुद्धि के एक अंश से ग्राह्यत्व और अन्य अंश से ग्राहकत्व की कल्पना करना भी उचित नहीं है ॥ १४ ॥ शून्यतापि न युक्तैवं बुद्धेरन्येन दृश्यता । युक्ताऽतो घटवत्तस्याः प्राक्सिद्धेश्च विकल्पतः ॥१५॥

  • आत्मनः—पाठान्तरम् । † अंशो०—पाठान्तरम् ।
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