उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी समस्त विकल्परहित कूटस्थ ब्रह्म, विकल्प का कारण कैसे होगा ? क्योंकि कारण तो व्यापारवान् को कहते हैं। इस शंका का उत्तर यह है कि सर्प का कारण जैसे रज्जु होती है, वैसे ही विवर्त का अधिष्ठान होने के कारण उस कूटस्थ विकल्परहित ब्रह्म में कारणता होती है। कूटस्थ प्रत्यगात्मा ब्रह्म में संपूर्ण कल्पनाओं (अतद्रूप से प्रतिभास कराने) का मूल और संसार की स्थिति का हेतुभूत अज्ञान है। तथाच चिदविद्या के विवर्तरूप कार्यों में सत्ता के रूप में भासमान होने से कूटस्थ में भी कारणता संगत होती है। अज्ञान में ‘संसारस्य नियामकम्'—संसार का नियामक—इस विशेषण के देने से सम्पूर्ण विकल्पनाओं के मूल में अज्ञान है, यह बात अन्वय-व्यतिरेकसंज्ञक अनुमान प्रमाण को सूचित कर रही है। तो क्या अज्ञानविशिष्ट ब्रह्म का ही प्रत्यक्त्वेन रूपेण अनुसन्धान करना चाहिये ? इस शंका के समाधान में बताते हैं कि नहीं, कार्यसहित अज्ञान का त्याग कर तत्साक्षी आत्मा को 'तत्त्वमसि'—इस महावाक्य से ‘अहं ब्रह्मास्मि' इत्युक्तलक्षण ब्रह्म समझें। अर्थात् अपनी आत्मा का मुक्त (कार्य-कारणप्रपञ्चसंसर्गरहित), अभय, अद्वय ब्रह्मरूप में चिन्तन करें ॥ १७ ॥ जाग्रत्स्वप्नौ तयोर्बीजं सुषुप्ताख्यं तमोमयम् । अन्योन्यस्मिन्नसत्त्वाच्च नास्तीत्येतत्त्रयं त्यजेत् ॥१८॥ जाग्रदिति—'अज्ञान' का परित्याग करने की प्रक्रिया यह है कि 'जाग्रत्' और 'स्वप्न' (स्थूल-सूक्ष्म विषय भोगरूप संसार) तथा उन दोनों की बीजभूत (हेतुभूत) अज्ञानमयी 'सुषुप्ति' अवस्थाओं का परस्पर एक-दूसरे की अवस्था में अभाव रहता है। अतः वास्तव में ये हैं ही नहीं। इस लिये इन तीनों का त्याग करना चाहिये ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी संसारनियामक अज्ञान का त्याग कर आत्मा को ब्रह्म समझे, यह बताया। किन्तु संसार क्या है? अज्ञान क्यों उसका कारण है? उस अज्ञान से आत्मा का विवेक कैसे हो सकेगा? इत्यादि प्रश्नों के उत्तर दिये जा रहे हैं— स्थूल-सूक्ष्म विषयभोगलक्षण जाग्रत्-स्वप्न यही संसार है। इन दोनों का कारणस्वरूप अज्ञानप्राय है, जिसे सुषुप्ति नाम से कहा जाता है। 'तमोमयम्' यहाँ 'मयट्' प्रत्यय के प्रयोग से अज्ञान की स्वतन्त्रता का वारण किया गया है। इस प्रकार कार्य-कारण का स्वरूप बताकर उन दोनों के त्याग का प्रकार बताते हैं—जाग्रत् और स्वप्न अर्थात् स्थूल- सूक्ष्म विषयभोगरूप संसार तथा उन दोनों की बीजभूत अज्ञानमयी सुषुप्ति अवस्था, इनका परस्पर एक-दूसरी अवस्था में अभाव होने के कारण वस्तुतः ये हैं ही नहीं। अतः इन तीनों को त्यागना चाहिये ॥ १८ ॥ आत्मबुद्धिमनेश्चक्षुरालोकार्थादिसङ्करात् । भ्रान्तिः स्यादात्मकर्मेति क्रियाणां सन्निपाततः ॥१९॥ आत्मेति—'त्याग करना चाहिये' इस विधि के सुनने से तो 'आत्मा' में कर्तृत्व की प्रतीति होती है, तब उसकी ब्रह्मरूपता कैसे सिद्ध हो सकेगी ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि देह (आत्मा), बुद्धि, मन, इन्द्रिय, प्रकाश, विषय और 'आदि' पद से देश-काल का परस्पर गुण-प्रधान भाव से अध्यास होने के कारण क्रियाओं का उद्भव (उत्पत्ति) होता है। इसी से आत्मा में कर्तृत्व की भ्रान्ति होती है। अर्थात् आत्मा कर्म (क्रिया) करता है—यह भ्रम होता है। आत्मा तो स्वतः निष्क्रिय है। अतः उसमें निष्क्रिय ब्रह्मरूपता के मानने में कोई विरोध नहीं है ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी तीनों अवस्थाओं का त्याग करने पर भी आत्मा का ब्रह्मत्व सिद्ध नहीं हो पा रहा है, क्योंकि 'त्यजेत्'- त्यागना चाहिये—इस प्रकार विधि होने से तो उसका (आत्मा का) कर्तृत्व प्रतीत हो रहा है। इस शंका का समाधान इस प्रकार होगा कि देह, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, प्रकाश, विषय, देश, काल आदि का गुण-प्रधान भाव से तादात्म्याध्यास होते रहने के कारण (संकर होने के कारण) क्रियाओं का उदय (उद्भव) होता है, उसी से ऐसी भ्रान्ति होती है कि यह