भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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१२६ उपदेशसाहस्री ऐसा जैनमतावलम्बी कहते हैं। देहपरिणाम मानने पर उसे परिच्छिन्न कहना होगा, तब उसका ब्रह्मत्व कैसे सिद्ध हो सकेगा ? तथा सब कुछ उस पर कल्पित है, यह कहना भी कल्पक के अभाव में संगत नहीं है। इसका खण्डन इस प्रकार करते हैं—इन्द्रियों की दृष्टि अपने-अपने गोलकों से परिछिन्न है, क्योंकि वे इन्द्रियाँ देह में ही होती हैं, देह के बाहर नहीं। अतः देह के अवयवभूत गोलकस्थान को ही उन दृष्टियों का परिच्छेदक मानना होगा। तथाच त्वगादि इन्द्रियाँ, यथायोग देहपरिमाण की होने से, और इन्द्रियों सहित देह के साथ तदाकारता (तादात्म्य) को प्राप्त हुई बुद्धि भी मध्यम परिमाण की (देहपरिमाण की) हो जाती है। उसे देखने वाला आत्मा, अपरिच्छिन्न रहने पर भी देहपरिमाण का-सा भ्रमवश दिखाई पड़ता है। वस्तुतः आत्मा देहपरिमाण नहीं है। उसे देहपरिमाण मानने पर घट-पटादि के समान सावयव और अनित्य कहना पड़ेगा, तथा पारलौकिक साधनों की ओर प्रवृत्ति नहीं हो पायेगी। उपर्युक्त उपाधियों के बिना आत्मा का स्वतः परिच्छेद उपलब्ध न होने से उसका ब्रह्मत्व (उसकी ब्रह्माकारता) उचित ही है। और जो निरवयव है, वस्तुतः उसके साथ किसी उपाधि का संसर्ग न हो पाने से उस पर सब कुछ कल्पित कहना भी उचित ही है। किञ्च देहपरिमाण मानने पर यदि उसे कर्मवशात् मनुष्य शरीर से कीट योनि प्राप्त हो जाय तो कीट शरीर में उसका प्रवेश होना संभव न हो सकेगा, और कीट योनि से हाथी आदि की योनि प्राप्त हो जाय तो हाथी के सर्व शरीर में व्याप्त न हो सकने से सम्पूर्ण शरीर के सुख-दुःखादि का वह अनुभव नहीं कर सकेगा। अतः आत्मा को विभुपरिमाण (सर्वव्यापक) ही मानना उचित है, वह स्वरूपतः अनन्त है। उसमें जो परिच्छिन्नता प्रतीत होती है, वह औपाधिक ही है॥ २२॥ क्षणिकं हि तदत्यर्थं धर्ममात्रं निरन्तरम्। सादृश्याद्दीपवत्तद्धीस्तच्छान्तिः पुरुषार्थता ॥२३॥ क्षणिकमिति—बौद्धों का सिद्धान्त है कि 'ज्ञान' और 'ज्ञेय' क्षणिक हैं, स्वभावतः नाशवान् हैं, वे धर्ममात्र (वस्तुमात्र) हैं अर्थात् निरधिष्ठान हैं तथा निरन्तर उत्पन्न होते रहते हैं। दीपक की शिखा के समान उनमें सादृश्य होने के कारण उनकी प्रत्यभिज्ञा होती है। अतः उनकी निवृत्ति ही परम पुरुषार्थ (निर्वाण) है। अभिप्राय यह है कि इनके मत में सभी पदार्थ क्षणिक विज्ञान मात्र हैं। विषयों के समान ही उनका ज्ञाता आत्मा भी क्षणिक है। जैसे दीप शिखा, या नदी का प्रवाह प्रतिक्षण नवीन उत्पन्न होता हुआ भी पूर्व सदृश होने के कारण उसकी प्रत्यभिज्ञा (वही यह है, इस प्रकार की प्रतीति) होती है, वैसे ही दृश्यमान वस्तु भी पूर्वसदृश होने के कारण स्थायी-सी प्रतीत होती है। उसमें स्थायित्वबुद्धि की निवृत्ति ही 'विवेक' है, और वही परम पुरुषार्थ है॥ २३॥ हृदयस्पर्शिनी दिगम्बर-जैन मत का खण्डन करके आत्मा की अनन्तता का जो प्रतिपादन किया, उसे शाक्य अर्थात् बौद्ध सहन नहीं कर पा रहे हैं, अतः उनका मत बता रहे हैं। बौद्धों का कहना है कि ज्ञान और ज्ञेय दोनों क्षणिक हैं, अर्थात् द्वि-त्रिक्षणावस्थायी भी नहीं हैं, अपितु वे स्वभावतः नाशशील (स्वरस-भङ्गुर) हैं, वे धर्ममात्र (वस्तुमात्र) हैं अर्थात् उस वस्तु का कोई स्थायी अधिष्ठान नहीं है। स्वरस-भङ्गुर रहने पर भी पूर्वोत्तर क्षणों में असद्बुद्धि नहीं होगी, क्योंकि वे धर्म (वस्तु) निरन्तर उत्पन्न होते रहते हैं। उनका कभी विच्छेद उपलब्ध नहीं होता। सभी वस्तु क्षणिक होने पर भी दीपशिखा के समान उनमें अत्यन्त सादृश्य होने के कारण 'तदेवेदम, सोऽहम्' इस प्रकार दृश्य-द्रष्टृ- विषयक उनकी प्रत्यभिज्ञा हुआ करती है। निष्कर्ष यह है कि बौद्धों के मत में यच्चयावत् पदार्थ क्षणिक हैं, विज्ञान मात्र हैं। जैसे विषय (पदार्थ, वस्तु, ज्ञेय) क्षणिक हैं, वैसे ही उनका ज्ञाता आत्मा भी क्षणिक है। जैसे दीपशिखा अथवा नदी का प्रवाह प्रतिक्षण नवीन उत्पन्न होता हुआ भी पूर्वसदृश होने के कारण पूर्व के-से (पहले के-से) ही प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार दृश्यमान वस्तुएँ भी पूर्वसदृश होने के कारण स्थायी जान पड़ती हैं। उनमें स्थायित्व-बुद्धि की निवृत्ति ही विवेक है और वही मोक्षरूप परम पुरुषार्थ है॥ २३॥ स्वकारान्यावभास* च येषां रूपादि विद्यते। येषां नास्ति ततश्चान्यत्पूर्वासङ्गतिरुच्यते ॥२४॥ *भास्यं०—पाठान्तरम्।