भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पार्थिवप्रकरणम् १३१ हृदयस्पर्शिनी इसपर भी बौद्ध पुनः शंका करता है कि भाव-अभाव के विभाग को जाननेवाली यद्यपि कोई वस्तु है, यह स्वीकार कर भी लिया जाय, तथापि वह अभिज्ञातृ वस्तु इसी प्रकार की (अर्थात् सत्) है, इस विशेषता के साथ उसका निर्धारण कर पाने में कोई कारण नहीं है। इस शंका के निराकरणार्थ उसके स्वरूप को बता रहे हैं-भावाभाव को जाननेवाला जो साक्षीस्वरूप है, वह सत्, असत् और सदसत् के विकल्प (विवाद) स्वरूप जगत् के पूर्व से ही सिद्ध है। क्योंकि विकल्प (विवाद) किसी आधार (आलम्बन) पर हुआ करता है, निराधार (निरालम्बन) विकल्प नहीं हुआ करता। अतः विकल्परूप दृश्य जगत् के पूर्व जो है, वह अद्वैत ही है। क्योंकि विकल्प (जगत्) के पूर्व विषमता रहने का कोई कारण ही नहीं है। विकल्प से पूर्व वही अद्वैत वस्तु समानरूप से है। उस अद्वैत वस्तु का स्वरूप द्वैत जड़ से विलक्षण है और वह अविनाशी होने से नित्य है। तथा अनृत (असत्य) से विलक्षण (भिन्न) रहने से वह सत्य है। पूर्वार्ध में 'विकल्पात् प्राग् यदिष्यते' के द्वारा उसका स्वतःसिद्धत्व बताने से उसकी ज्ञानस्वरूपता बताई गई है। 'अद्वैतम्' से उसकी अनन्तता बताई गई है। 'नित्यम्' के द्वारा कूटस्थत्व बताने से दुःखाभाव को सूचित किया गया है और उससे अभिन्न रहनेवाली (अर्थात् दुःखाभाव से सम्बद्ध) आनन्दरूपता को ध्वनित किया गया है। तथाच यह आत्मतत्त्व सत्य-ज्ञान-अनन्त-आनन्दरूप है, यह अनुभव से ही सिद्ध होता है, किसी अन्य कारण के अन्वेषण की आवश्यकता नहीं है ॥ ३३ ॥ विकल्पोद्भवतोऽसत्त्वं स्वप्नदृश्यवदिष्यताम् । द्वैतस्य प्रागसत्त्वाच्च सदसत्त्वादिकल्पनात् ॥३४॥ विकल्पेति-द्वैत (असत्त्व) का आविर्भाव विकल्प से हुआ है और सत्त्व (सत्ता) और असत्त्व (असत्ता) आदि की कल्पना होने से पूर्व उसका (द्वैत का) अभाव है। अतः स्वप्न के दृश्य के समान उसका (द्वैत का) अभाव ही मानना चाहिये ॥ ३४ ॥ हृदयस्पर्शिनी नानाविध द्वैत के प्रतीयमान रहते हुए अद्वैत आत्मतत्त्व का अनुभव हो रहा है, यह कैसे कह सकते हैं ? अथवा द्रष्टा की सत्यता को बताकर दृश्य के विकल्पात्मक रहने से उसकी असत्यता को बता रहे हैं। द्वैत का आविर्भाव विकल्प से हुआ है। वस्तु के न रहने पर भी (अस्तित्व-सत्ता-न रहने पर भी) शब्द मात्र से जिसका बोध होता हो, उसे विकल्प कहते हैं- 'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः'। यह प्रतिभासमान संसार अविद्या (माया) के कारण अध्यस्त होने से विकल्परूप ही है। वास्तव में वह है नहीं, केवल भ्रम से उसकी प्रतीति हो रही है, उस कारण इसे विकल्प से आविर्भूत हुआ कहते हैं; जैसे स्वप्नदृश्य वस्तुतः नहीं रहता, फिर भी उसकी प्रतीति होती है। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा- 'द्वैतं न परमार्थसत् दृश्यत्वात् स्वप्नदृश्यवत्'। उसके मिथ्यात्व में एक अन्य हेतु भी है- 'सदसत्त्वादिविकल्पनात् प्राक् असत्त्वात्' - अर्थात् सत्ता और असत्ता आदि की कल्पना करने से पूर्व इसका स्वप्नदृश्य के समान अभाव था। द्वैतरूप प्रपञ्च की अज्ञातसत्ता में कोई प्रमाण नहीं है। अतः द्वैतात्मक प्रपञ्च (संसार) को मिथ्या ही समझना चाहिए ॥ ३४ ॥ वाचारम्भणशास्त्राच्च विकाराणां ह्यभावता । मृत्योः स मृत्युमित्यादेर्मम मायेति च स्मृतेः ॥३५॥ वाचारम्भणेति- 'ये सब घट-पटादि विकार वाणी से आरम्भ होने वाले हैं'- इस शास्त्रवाक्य से, और 'वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है' - इस श्रुति से तथा 'मेरी माया का पार पाना कठिन है'- इस स्मृति से विकारों का अभाव ही सिद्ध होता है ॥ ३५ ॥

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित) · पृष्ठ 157, कुल 364 में से · BharatKosha