उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपार्थिवप्रकरणम् १४५ इति प्रणुन्ना द्वयवादकल्पना निरात्मवादाश्च तथा हि युक्तितः । व्यपेतशङ्काः परवादतः स्थिरा मुमुक्षवो ज्ञानपथे स्युरित्यतः* ॥६८॥ इतीति—इस प्रकार द्वैतवाद की कल्पना और निरात्मवाद का युक्तिपूर्वक खण्डन कर दिया गया। अतः मुमुक्षु विद्वान् लोग अन्यान्य वादों में न फँस कर सब प्रकार की शङ्काओं (सन्देह) का परित्याग करके अर्थात् निःशङ्क होकर वेदान्तशास्त्रनिर्दिष्ट ज्ञानमार्ग में स्थिर हो जायें ॥ ६८ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार भेदवाद की कल्पनाओं का युक्तिपुरःसर खण्डन किया गया, उसी तरह निरात्मवादी बौद्धों की कल्पनाओं का भी खण्डन किया गया। अतः मुमुक्षुगण वेदान्तातिरिक्त अन्यान्य शास्त्रीय वादों की ओर से निःशङ्क होकर वेदान्तोक्त ज्ञानमार्ग में सुस्थिर हो जायें ॥ ६८ ॥ स्वसाक्षिकं ज्ञानमतीव निर्मलं विकल्पनाभ्यो विपरीतमद्वयम् । अवाप्य सम्यग्यदि निश्चितो भवेत् निरन्वयो निर्वृतिमेति शाश्वतीम् ॥६९॥ स्वसाक्षिकमिति—इस आत्मसाक्षिक, अत्यन्त निर्मल, सब प्रकार की कल्पनाओं से विपरीत और अद्वय (अद्वैत) ज्ञान को प्राप्त करके मोक्षपथिक विद्वान् यदि सम्यक्तया निश्चय कर ले तो वह सम्पूर्ण अज्ञान और उसके कार्यों के सम्बन्ध से रहित होकर नित्य शान्ति अर्थात् अखण्ड आनन्दानुभव को प्राप्त कर लेता है ॥ ६९ ॥ हृदयस्पर्शिनी वेदान्तविहित ब्रह्मात्मज्ञान ही पुरुषार्थ का साधन है, इसलिये उसके स्वरूप को बताते हुए मुमुक्षुओं को तन्निष्ठ होने की आवश्यकता बता रहे हैं—इस स्वसाक्षिक (आत्मसाक्षिक), अत्यन्त निर्मल, विविध प्रकार की कल्पनाओं के विपरीत, और अखण्डवस्तुमात्राकार (अद्वय) ज्ञान को प्राप्त कर साधक यदि सम्यक् प्रकार से निश्चय कर ले तो वह अज्ञान और उसके कार्य के सम्बन्ध से रहित होकर अखण्ड आनन्दानुभवस्वरूपाविर्भावरूप शाश्वती निर्वृति का अनुभव करता है ॥ ६९ ॥ इदं रहस्यं परमं परायणं व्यपेतदोषैरभिमानवर्जितैः । समीक्ष्य कार्या मतिरार्जवे सदा न तत्त्वदृक्स्वा†न्यमतिर्हि कश्चन ॥७०॥ इदमिति—दोषरहित और अभिमानरहित मुमुक्षु विद्वान् इस परमगति रूप परम रहस्य का सम्यक् चिन्तन करके सर्वदा स्व-स्वरूप ब्रह्म में एकनिष्ठ हो जायें। आत्मा से भिन्न वस्तु में निष्ठा रखने वाला (अपने आराध्य को आत्मा से भिन्न मानने वाला) कोई भी पुरुष तत्त्ववेत्ता नहीं हो सकता ॥ ७० ॥ हृदयस्पर्शिनी यथोक्त ज्ञान के अधिकारी को बताते हुए तत्त्वनिष्ठा के स्वरूप को बता रहे हैं—जिसे पा कर शाश्वती निर्वृति को प्राप्त करता है, वह रहस्य एकमात्र उपदेशगम्य ही है। वह परमात्मतत्त्व का प्रकाशक होने से सर्वोत्तम (परम) है। वह निरवधिक सर्वाश्रय-परमगतिरूप (परायण) है। इस प्रकार आत्मज्ञान को सम्यक् आलोचना के द्वारा दृढ़ करे। इस प्रकार के आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिये इन्द्रियों की बहिर्मुखता को दूर करना होगा, और पाण्डित्य आदि के कारण उत्पन्न हुए चित्तदोषों को दूर कर (अभिमानरहित होकर) शान्त-दान्त बनना होगा। ऐसा अधिकारी ही अपनी बुद्धि को समस्वरूप (आर्जव अर्थात् ऋजुभावापन्न) ब्रह्मात्मतत्त्व में परिनिष्ठित कर सकता है। ब्रह्मात्मतत्त्व ही सर्वदा, सर्वत्र एकरूप होने से 'ऋजु' कहलाता है। उसके स्वरूप को ही आर्जव कहते हैं। क्योंकि उसमें निर्विशेषता रहती है। तथाच ब्रह्माऽभेदेन आत्मज्ञाननिष्ठा को ही तत्त्वनिष्ठा कहते हैं। इसी को व्यतिरेककथन के द्वारा विशद (स्पष्ट) कर रहे हैं—जो कोई प्रत्यगात्मा से भिन्न वस्तु को ही ब्रह्म मानकर, यदि उसी में निष्ठा रखनेवाला है, तो
- त्यतः—पाठान्तरम् । † शाप्यमति०—पाठान्तरम् । १९